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मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

कैसा होता है वो प्रेम ?

अभी कुछ दिन पहले अमृता और इमरोज जी के बारे में कुछ पढ़ा और वो दिल में उतर गया । तभी कुछ भाव उभरे जिन्हें शब्दों में बाँधने की कोशिश की है --------------


ना वादा किया
ना वादा लिया
मगर फिर भी
साथ चले
ना इंतज़ार किया
ना इंतज़ार लिया
मगर फिर भी
हमेशा साथ रहे
कभी अल्फाज़ की
जरूरत ना रही
दिल ने ही दिल से
मुलाक़ात की
भावों को पढने के लिए
नज़रों ने ही नज़रों से
बात की
जो तुम कह ना सकी
जो मैं कह ना सका
मगर रूह ने रूह से
फिर भी बात की
वादों पर गुजर करने वाले
प्रेमी नही होते
आँख में अश्क जो दे
वो साहिल नही होते
कुछ प्रेम देह के पिंजर से अलग
रूह के अवसान के लिए होते हैं
वादों की खोखली
चादर में लिपटे नही होते
इंतज़ार के पैबंद के
मोहताज़ नही होते
लफ़्ज़ों की बानगी की जहाँ
जरूरत नही होती
प्रेम अभिव्यक्ति का
मोहताज़ नही होता
सिर्फ रूह ही रूह की
सरताज होती है
रूह ही रूह की
माहताब होती है
कैसा होता है वो प्रेम
या
सिर्फ वो ही प्रेम होता है

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

उसने पुकारा मुझको

कल का दिन
मेरी ज़िन्दगी का
वो दिन था
जब मैं ज़िन्दगी के
करीब था
वो
जिससे मैंने मिलना चाहा
इक नज़र देखना चाहा
लाखों पैगाम भेजे
मिन्नतें की
सदके किये
मगर ये सोच
पत्थर भी कभी
पिघले हैं
खामोश हो जाता था
और अपनी
मोहब्बत से मजबूर हो
बार - बार
आवाज़ दिए जाता था
मगर उस दर पर
कभी मेरी
ना फरियाद कबूल हुई
ना ही कोई
जवाब आया
मगर ना जाने
ये मोहब्बत की
कशिश थी
या मेरी
दुआओं का असर
कल मेरी मोहब्बत ने
पुकारा मुझको
आवाज़ दी
हिमखंड शायद
पिघल रहा था
लम्हा वहीँ ठहर गया
शब्द वहीँ रुक गए
जुबान खामोश हो गयी
धडकनों की धड़कन भी
थम सी गयी
मेरे पंखों को
परवाज़ मिल गयी थी
मेरे गीतों को
आवाज़ मिल गयी थी
होशो- हवास ना जाने
किन फिजाओं में
तैर रहे थे
ख्वाबों को भी शायद
पंख मिल रहे थे
तन- मन झंकृत
हो रहा था
बिना साज के सुर
सज रहे थे
गीतों की बयार
बहने लगी थी
मैं कल्पनाओं के
आकाश में
विचर रहा था
तभी उसने फिर पुकारा
तब ख्यालों की
नींद से जागा
यथार्थ के धरातल
पर उतरा
यूँ लगा
किसी दर्द के गहरे
कुएं से आवाज़ आई हो
किस मजबूरी से मजबूर हो
उसने पुकारा मुझे
किस बेबसी से बेबस हो
आवाज़ दी होगी
इस ख्याल ने ही
रूह कंपा दी मेरी
वो जो मिलना तो दूर
बात भी ना करना चाहती हो
वो जो ख्यालों में भी
किसी को ना आने देती हो
वो जो हवाओं के
साये से भी
कतराती हो
वो जो चांदनी से भी
घबराती हो
वो जो गुलों के
खिलने से भी
शरमा जाती हो
ना जाने किस
भावना के वशीभूत हो
उसने पुकारा मुझे
उसके दर्द की
थाह कैसे पाउँगा
किन शब्दों का
मरहम लगाऊँगा
कैसे उसकी सर्द आवाज़ में
ठहरे दर्द के सागर को
लाँघ पाउँगा
कैसे उसे उसके दर्द से
जुदा कर पाउँगा
कैसे उसके जीवन के
गरल को सुधा सागर में
बदल पाउँगा
कहाँ से वो दामन लाऊँ
जहाँ मिलन की
ख़ुशी को सहेजूँ
या
उसके दर्द की
इम्तिहान देखूँ
किस दामन में
उसकी बेबसी के
दर्द की
मिटटी को समेटूँ


सोमवार, 21 दिसंबर 2009

एक कोशिश

कुछ परवाजों को पंख नही मिला करते
कुछ दरख्तों पर फूल नही खिला करते

अब तो कलमों की स्याही भी सूख चुकी है



कोई मेरे आंसुओं को पिए ----तो क्यूँ?
कोई मेरे ज़ख्मों को सिंए ----तो क्यूँ ?

यादों का उधड़ना अभी बाकी है


लबों पर जो हमने, ख़ामोशी का कफ़न ओढ़ लिया
तो दर्द मेरा, क्यूँ तेरे चेहरे पर उतर आया है

क्या चाहत का कोई क़र्ज़ अब भी बाकी है

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

कहाँ सजाऊँ इसे

तेरे रूप के सागर में
उछलती -मचलती
लहरों सी
चंचल चितवन
जब तिरछी होकर
नयन बाण चलाती है
ह्रदय बिंध- बिंध जाता है
धडकनें सुरों के सागर पर
प्रेम राग बरसाती हैं
केशों का बादल
जब लहराता है
सावन के कजरारे
मेघ छा जाते हैं
अधरों की अठखेलियाँ
कमल पर ठहरी ओस -सी
बहका- बहका जाती हैं
क़दमों की हरकत पर तो
मौसम भी थिरक जाते हैं
ऋतुओं के रंग भी
बदल- बदल जाते हैं
रूप- लावण्य की
अप्रतिम राशि पर तो
चांदनी भी शरमा जाती है
फिर कैसे धीरज
रख पाया होगा
तुझे रचकर विधाता
कुछ पल ठिठक गया होगा
और सोच रहा होगा
लय और ताल के बीच
किसके सुरों में सजाऊँ इसे
किस शिल्पकार की
कृति बनाऊँ इसे
किस अनूठे संसार में
बसाऊँ इसे
किसके ह्रदय आँगन में
सजाऊँ इसे
किस भोर की उजास
बनाऊँ इसे
किस श्याम की राधा
बनाऊँ इसे

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

प्रेम को साकार बना दें ...........१०० वी पोस्ट

दोस्तों ,

आज ज़िन्दगी पर १०० वी पोस्ट डाल रही हूँ । उम्मीद करती हूँ हमेशा की तरह इसे भी आप सबका स्नेह प्राप्त होगा।

इक उम्र
इंतज़ार किया तेरा
तुम अपने जीवन की
हलचलों में गुम थे
मैं अपनी ज़िन्दगी की
खानाबदोशी में खुश थी
मगर फिर भी
इक प्यास थी
किसी की चाहत थी
एक आस थी
एक विश्वास था
कोई न कोई
तो होगा
जो मेरा होगा
या किसी की
रूह की तस्वीर
मैं होऊँगी
देह का जीवन तो
जी चुकी थी
रूह का जीवन
अभी सूना था
न जाने किस
इंतज़ार में.........
ज़िन्दगी यूँ ही
गुजरती रही
और उम्र यूँ ही
बढती रही
आज जब सोच
कुंद हो चुकी है
मानस क्षुब्ध
हो चुका है
चाहत सब
भस्म हो चुकी है
उम्र का आखिरी
पड़ाव आ चुका है
उस पड़ाव पर
तुम मिले हो मुझे
मेरा इंतज़ार करते हुए
जन्मों से खोज रहे थे
मिलन की बाट जोह रहे थे
विरह- व्यथा का दावानल
जो अंतस में जला था
आओ चिर- प्रतीक्षित
उर- ज्वाला को
भावों की चांदनी में
नहला दें
तुम्हारे चेहरे की लकीरों में
छुपे वियोग के दर्द को
कुछ चाहत का मरहम लगा दूँ
जन्मों से तेरी नज़रों में
ठहरे पतझड़ को
अपनी नज़रों के नेह से
वासंतिक बना दूँ
अधरों पर पसरे मौन को
शब्दों का जामा पहना दूँ
अब मत पढो
चेहरे को
तुम्हारा ही अक्स
नज़र आएगा
तुम और मैं
दो थे ही कब
वक्त का ही
तो परदा था
जो इंतज़ार का दर्द
तूने सहा
वो क्या मुझसे
जुदा था
आओ , आज मिलन
को साकार बना दें
जन्मों से बिछड़े
प्रेम को साकार बना दें
दोनों के अव्यक्त प्रेम को
प्रेम का प्रतिबिम्ब बना
चिरनिद्रा में सो जाएँ
रूह का रूह से
मिलन करा दें
आओ , प्रेम को
साकार बना दें

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

मैं नहीं आने वाली

अब मुझे
मत पुकारना
ना देना आवाज़
मैं नही आने वाली
लम्हा - लम्हा
युग बना
तेरा इंतज़ार
करते- करते
और युग
बीतते- बीतते
जन्म बदल गए
जन्मों के बिछड़े हैं
जन्मों तक
बिछड़ते ही रहेंगे
अब तेरे प्रेम की
चाह में ना तडपेंगे
ना तुझे आवाज़ देंगे
ना तेरे दीदार को तरसेंगे
जन्मों की प्यास को
अब और बढ़ाना होगा
तुझे मुझसे
मिलने से पहले
ख़ुद को भी
इसी आग में
अब जलाना होगा
एक बार फिर
जन्मों के इंतज़ार को
अगले कुछ और
जन्मों तक
निभाना होगा
इंतज़ार के लम्हों को
तुझे भी तो जीना होगा
जन्मों की मौत को
तुझे भी तो सहना होगा
कुंदन बनने के लिए
तुझे भी तो तपना होगा
मेरे प्यार के काबिल बनने के लिए
इस आग को सहना होगा
फिर आवाज़ देना मुझे
जब आग का दरिया पार कर लो
फिर आवाज़ देना मुझे
जब ख़ुद को इतना तपा लो
फिर आवाज़ देना मुझे
अपने प्रेम का अहसास करवाना
गर तेरे प्रेम पर
यकीं आया मुझे
तो इक प्रेम परीक्षा देना
गर हो गए अनुत्तीर्ण
फिर ना आवाज़ देना मुझे
मैं नही आने वाली

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

आखिरी ख़त

मेरा ये आखिरी ख़त
और ये अन्तिम शब्द
क्या तुम्हें
उद्वेलित कर पाएँगे?
मेरी ह्रदय व्यथा को
क्या ये बयां कर पाएँगे?
गर कर दिया बयाँ
तो क्या तुम
उसे समझ पाओगी?
गठबंधन में बँधे
जब हम तुम
वचन लिया था दोनों ने
इक दूजे को चाहेंगे
साथ न छोड़ेंगे इक पल
फिर कौन सी
मुझसे खता हुई
जिसकी ये सज़ा मिली
क्या प्रेम में मेरे
कोई खोट था
या कोशिशें मेरी
नाकाम रही
तुम्हारी इक -इक अदा पर तो
मेरे दिल-ओ-जान गए
तुम्हारी हर ख्वाहिश को
मैंने अपना बनाया
तेरे लबों के तबस्सुम पर तो
दिल मेरा मचलता था
कौन सी ख्वाहिश ऐसी
जो न पूरी कर पाया मैं
कौन सी ऐसी हसरत थी
जिसे समझ न पाया मैं
फिर भी किस खता की
सज़ा दे चली गई तुम
पल-पल युगों सा बीतता है
और पल -पल में
युगों सी मौत मरा मैं
बाबुल के अँगना जाकर
पिया का दामन भुला दिया
एक चाहने वाले को
खतावार बना दिया
मेरे हर प्रयास को
निराशा का जामा पहना दिया
हर दरवाज़ा तुमने बंद किया
हर आस को तुमने तोड़ दिया
घनघोर निराशा फैली है
अब जीवन बगिया मेरी सूनी है
किस आस के सहारे जियूँ में
किसको अपना कहूँ मैं
तुम बिन जग
सूना लगता है
जीना मौत से
बदतर लगता है
रोज काँटों की
सेज पर सोता हूँ
हर पल तुम्हारे
लिए ही रोता हूँ
अब न रहा वश ख़ुद पर
कोई राह न सूझती है
तुम बिन प्रिया
जीवन की डगर अधूरी है
कैसे अधूरा जियूँ मैं
ये ज़हर का घूँट
कैसे पियूँ मैं
अब न सहा जाता है
तुम बिन रहा न जाता है
दरो- दीवार में
तुम्हारा
अक्स ही
नज़र आता है
इसलिए
विदा चाहता हूँ तुमसे
अन्तिम विदाई देना मुझे
कर सको तो इतना करना
अन्तिम यात्रा में आकर
दीदार अपना दिखा जाना
जो जीते जी न मिला
वो सुकून रूह को तो
दिला जाना
इस आखिरी ख़त को भी
चिता के साथ जला देना
जैसे मुझे भुला दिया
वैसे ही हर याद को वहीँ जला देना
अब आखिरी सलाम लो मेरा
लो अब ख़ुद को
ख़त्म मैं करता हूँ
और तुमसे
अन्तिम विदा मैं लेता हूँ

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

सूखे दरख़्त का दर्द

अपनी दुनिया में मस्त हैं सभी
हम ही सबसे विलग हैं
जितनी रात गहरी होगी
अकेलापन अभी और बढेगा
हर काले गहराते साये के साथ
तन्हा सफर कैसे कटेगा
दिन भी गुजरा, साँझ भी गुजर गई
रात का दामन ही क्यूँ गहरा है
रात के बढ़ते पहरों पर अब
वक्त का न कोई पहरा है
जीवन की इस सांझ का
अब न कोई सवेरा है
पल - छिन पंख लगाकर
अब नही उड़ पाते हैं
इक - इक पल में गहराते
अकेलेपन के साये हैं

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

यादों का सन्नाटा

यादों की सूनी
पगडण्डी पर
जो कदम पड़ा
दूर -दूर तक
एक सन्नाटा ही
बिखरा पड़ा था
कहीं सूखे
पत्तों के नीचे
यादों का मलबा
दबा हुआ था
तो कहीं
किसी शाख से लिपटी
कोई अधूरी - सी ,
बिखरी - सी याद
अपनी बेबसी पर
आंसू बहाती मिली
कोई याद वक्त के
शोलों में जलती मिली
तो कोई याद
मन के रसातल में
दबी-सिसकती मिली
मगर फिर भी
उनका सन्नाटा
उनकी सिसकियाँ
भी न तोड़ पायीं
न जाने कैसी
वो यादें थीं
और कैसा
घनघोर सन्नाटा था
शायद यादों के
अंतस का सन्नाटा था
जहाँ कभी कोई
दिया जला न पाया था
किसी चाँद की चांदनी
वहां तक कभी
पहुँच ही ना पाई थी
सिर्फ़ सन्नाटा
यादों को सीने से लगाये
उनके दर्द को,
उनके ज़ख्मों को
अपनी ख़ामोशी से
सहला रहा था