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रविवार, 24 अप्रैल 2011

धूप भी मजबूर होती है

अब नहीं उतरती धूप
मेरे चौबारे पर
शायद कहीं और
आशियाँ बना लिया उसने
कौन उतरता है
सीले हुए मकान में
घुटन , बदबूदार
अँधेरी कोठरियां
डराती हैं
बंद तहखाने
हजारों कीड़ों की
शरणस्थली बन जाते हैं
ये रेंगते हुए
कीड़े मकौड़े
किसी और के
अस्तित्व को
स्वीकार नहीं पाते
डँस लेते हैं
अपने दंश से
धराशायी कर देते हैं
लहूलुहान हो जाता है
बिखरा हुआ अस्तित्व
ऐसी चौखटों पर
कौन आशियाना
बनाना चाहेगा
जिस पर सुबह
का पैगाम ना
पहुँचता हो
जिस पर सांझ की
बाती ना जलती हो
जहाँ सिर्फ और सिर्फ
अंधेरों का वास हो
बताओ कैसे
उन चौबारों पर
धूप उतरेगी
किसे गर्माहट देगी
किसे अपने रेशमी
स्पर्श से सहलाएगी
कैसे अँधेरी खोह में
छुपी नमी को सुखाएगी
आखिर उसकी भी
एक सीमा होती है

सीमाओं का अतिक्रमण 
चाह कर भी नही कर पाती
एक मर्यादा होती है
शायद इसलिए
अपना आशियाना
बदल देती है
धूप भी मजबूर होती है

दस्ताने पहनने को………

44 टिप्‍पणियां:

Rakesh Kumar ने कहा…

धूप भी मजबूर होती है
दस्ताने पहनने को………

है तेरी रौशनी में जो दम
तू अमावस को करदे पूनम

"न तद्भासयते सूर्यो न शशांको न पावकः"

उसकी धूप को दस्ताने कैसे पहनाएँगी वंदनाजी.
उसको ध्याया है तो वह आएगा ही.और फिर
रौशनी में नहाओगी ही नहीं सभी को नहला दोगी.

संगीता पुरी ने कहा…

अच्‍छी अभिव्‍यक्ति !!

Kajal Kumar ने कहा…

:)

अमि'अज़ीम' ने कहा…

laajabaab didi

Sunil Kumar ने कहा…

धूप की मज़बूरी या हमारा आशियाना ? बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति,

Swarajya karun ने कहा…

@ ऐसी चौखटों पर
कौन आशियाना
बनाना चाहेगा
जिस पर सुबह
का पैगाम ना
पहुँचता हो
जिस पर सांझ की
बाती ना जलती हो
जहाँ सिर्फ और सिर्फ
अंधेरों का वास हो .
---यथार्थ है, लेकिन आज ऐसी ही चौखटों को रौशन करने की ज़रूरत है,जहां अन्धेरा ही अन्धेरा है. बहरहाल एक संवेदनशील रचना के लिए आभार.

राजेश उत्‍साही ने कहा…

अब नहीं उतरती धूप
मेरे चौबारे पर
शायद कहीं और
आशियाँ बना लिया उसने
कौन उतरता है
सीले हुए मकान में
*

वंदना जी, इतनी ही कविता पर्याप्‍त है। सारी बात इसमें आ जाती है।

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

अच्‍छी अभिव्‍यक्ति !!

यशवन्त माथुर ने कहा…

धूप की मजबूरी को ब खूबी उभारा है आपने.

सादर

वन्दना महतो ! (Bandana Mahto) ने कहा…

अब नहीं उतरती धूप
मेरे चौबारे पर
शायद कहीं और
आशियाँ बना लिया उसने
कौन उतरता है
सीले हुए मकान में

bahut gahra likh gayi hai vandana ji .......ahsaason se bhari hui ye kavita hai.

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

धूप की राह में किसी मल्टी ने अपना घेरा तो नहीं बना दिया ।

गौरव शर्मा "भारतीय" ने कहा…

धूप भी मजबूर होती है
दस्ताने पहनने को………
वाह,,,बेहतरीन भावाभिव्यक्ति !!

mahendra verma ने कहा…

ऐसी चौखटों पर
कौन आशियाना
बनाना चाहेगा
जिस पर सुबह
का पैगाम ना
पहुँचता हो
जिस पर सांझ की
बाती ना जलती हो
जहाँ सिर्फ और सिर्फ
अंधेरों का वास हो ।

आशियानों का दर्द सजीव होकर कविता में उतर आया है।
मन पर अमिट चिह्न छोड़ती यह कविता अच्छी लगी।

निवेदिता ने कहा…

वन्दना जी -आपकी कविता ने तो छाया के आगे धूप को भी गौण कर दिया ......बहुत खूब !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बादल छा जाते हैं
तो धूप भी मजबूर होती है
क्योंकि छाँव
नशे में चूर होती है!
--
बहुत सुन्दर रचना!

अक्षय-मन ने कहा…

एक मर्मस्पर्शी रचना ......
अक्षय-मन

संध्या शर्मा ने कहा…

धूप भी मजबूर होती है..
आखिर उसकी भी
एक सीमा होती है
सीमाओं का अतिक्रमण
चाह कर भी नही कर पाती...
खासकर ये पंक्तियाँ बहुत प्रभावित करती हैं. भावप्रवण, संवेदनशील रचना...

रचना दीक्षित ने कहा…

धूप भी मजबूर होती है
वाह !!!सुन्दर अभिव्यक्ति

रचना दीक्षित ने कहा…

धूप भी मजबूर होती है
वाह !!!!
सुन्दर अभिव्यक्ति

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

दूसरों का ख्याल रखने वालों का यही हाल होता है।

एम सिंह ने कहा…

बहुत अच्छा

मेरी नई पोस्ट देखें
मिलिए हमारी गली के गधे से

ZEAL ने कहा…

धूप भी मजबूर होती है
दस्ताने पहनने को………

Beautiful imagination !

.

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति|आभार|

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर....

chirag ने कहा…

that was a nice poem
really like it
http://iamhereonlyforu.blogspot.com/

अमित श्रीवास्तव ने कहा…

nice feelings...

Kailash C Sharma ने कहा…

धूप उतरेगी
किसे गर्माहट देगी
किसे अपने रेशमी
स्पर्श से सहलाएगी
कैसे अँधेरी खोह में
छुपी नमी को सुखाएगी
आखिर उसकी भी
एक सीमा होती है
.....
क्या कोमल अहसास हैं.. अद्भुत प्रस्तुति

M VERMA ने कहा…

धूप भी मजबूर होती है
दस्ताने पहनने को………
विरोधाभाषी तेवर की रचना ...
सुन्दर अभिव्यक्ति

Dr Varsha Singh ने कहा…

रचना में भावाभिव्यक्ति बहुत अच्छी है.. ...बधाई.

: केवल राम : ने कहा…

बादल छा जाते हैं
तो धूप भी मजबूर होती है
क्योंकि छाँव
नशे में चूर होती है!

वाह क्या बिम्ब उभारा है आपने .....छाँव का नशे में चूर होना बहुत गहरे अर्थ संप्रेषित करता है ....आपका आभार

वाणी गीत ने कहा…

जहाँ सिर्फ अँधेरे का वास हो , धूप कब तक सर पटकेगी ...
सार्थक अभिव्यक्ति !

udaya veer singh ने कहा…

utkrisht rachana ka hriday se swagat . abhar ji

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

...

संजय भास्कर ने कहा…

जिस पर सुबह
का पैगाम ना
पहुँचता हो
जिस पर सांझ की
बाती ना जलती हो
जहाँ सिर्फ और सिर्फ
अंधेरों का वास हो .
.. संवेदनशील रचना के लिए आभार....वन्दना जी

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

hriday ke sookshmtam bhavon ki prabhavpoorn rachna.

Pradeep Kumar ने कहा…

बताओ कैसे
उन चौबारों पर
धूप उतरेगी
किसे गर्माहट देगी
किसे अपने रेशमी
स्पर्श से सहलाएगी
कैसे अँधेरी खोह में
छुपी नमी को सुखाएगी
आखिर उसकी भी
एक सीमा होती है
सीमाओं का अतिक्रमण
चाह कर भी नही कर पाती
एक मर्यादा होती है
शायद इसलिए
अपना आशियाना
बदल देती है
धूप भी मजबूर होती है
दस्ताने पहनने को………
sundar rachna
baat to sahi hai lekin kisi ne kahaa hai ki
main uske angan me bikhar bikhar jaati
wo apne ghar ke dareeche agar khule rakhta

सदा ने कहा…

अब नहीं उतरती धूप
मेरे चौबारे पर
शायद कहीं और
आशियाँ बना लिया उसने
कौन उतरता है
सीले हुए मकान में

गहन भावों का समावेश इन पंक्तियों में ।

वृजेश सिंह ने कहा…

kaphi satark aur sateek baat kahi aapne. ek taraf andhere ki tarafdaari aur dusre taraf na pahunch pane ki majburi bhi hai......accha laga padhkar.

shikha varshney ने कहा…

आह धुप भी निकली बेगानी...
बेहतरीन अभिव्यक्र्ती.
बहुत सुन्दर लिखा है आपने.

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

behtareen.

दीपक 'मशाल' ने कहा…

bahut hi badhiya..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत गहन अभिव्यक्ति ...

इमरान अंसारी ने कहा…

वंदना जी,

सुभानाल्लाह......बहुत शानदार.....इस पोस्ट के लिए आपको सलाम......हर बात बहुत गहरी है .....प्रशंसनीय|

सुमन'मीत' ने कहा…

jaan daar ...bahut sundar...