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मंगलवार, 29 नवंबर 2011

स्वीकार सको तो स्वीकार लेना





सुना है
आज के दिन 
वरण किया था
सीता ने राम का 
जयमाल पहनाकर
और राम ने तो 
धनुष के तोड़ने के साथ ही
सीता संग जोड़ ली थी
अलख प्रीत की डोरी
कैसा सुन्दर होगा वो दृश्य
जहाँ ब्रह्माण्ड नायक ने
आदिसृष्टि जगत जननी के साथ
भांवरे भरी होंगी
उस अलौकिक अद्भुत
अनिर्वचनीय आनंद का अनुभव
क्या शब्दों की थाती कभी बन सकता है
आनंद तो अनुभवजन्य प्रीत है
फिर भुवन सिन्धु का भुवन सुंदरी संग
मिलन की दृश्यावली 
जिसे शेष ना शारदा गा पाते हैं
वेद भी ना जिनका पार पाते हैं
तुलसी की वाणी भी मौन हो जाती है 
चित्रलिखि सी गति हो जाती है 
उसका पार मैं कैसे पाऊँ
कैसे उस क्षण का बखान करूँ
बस उस आनंद सिन्धु में डूबने को जी चाहता है
कोटि कोटि नमन करती हूँ
 जीव हूँ ना ...........
बस नमन तक ही मेरी शक्ति है
यही मेरी भक्ति है ..........स्वीकार सको तो स्वीकार लेना 

शनिवार, 26 नवंबर 2011

हाँ ,आ गया हूँ तुम्हारी दुनिया में




हाँ, आ गया हूँ 
तुम्हारी दुनिया में
अरे रे रे ...........
अभी तो आया हूँ
देखो तो कैसा 
कुसुम सा खिलखिलाया हूँ

देखो मत बाँधो मुझे
तुम अपने परिमाणों में 
मत करो तुलना मेरे 
रूप रंग की 
अपनी आँखों से
अपनी सोच से 
अपने विचारों से
मत लादो अपने ख्याल 
मुझ निर्मल निश्छल मन पर

देखो ज़रा 
कैसे आँख बंद कर 
अपने नन्हे मीठे 
सपनो में खोया हूँ
हाँ वो ही सपने
जिन्हें देखना अभी मैंने जाना नहीं है
हाँ वो ही सपने
जिनकी मेरे लिए अभी 
कोई अहमियत नहीं है
फिर भी देखो तो ज़रा
कैसे मंद- मंद मुस्काता हूँ
नींद में भी आनंद पाता हूँ

रहने दो मुझे 
ब्रह्मानंद के पास
जहाँ नहीं है किसी दूजे का भास
एकाकार हूँ अपने आनंद से
और तुम लगे हो बाँधने मुझको
अपने आचरणों से
डालना चाहते हो 
सारे जहान की दुनियादारी 
एक ही क्षण में मुझमे
चाहते हो बताना सबको
किसकी तरह मैं दिखता हूँ
नाक तो पिता पर है
आँख माँ पर 
और देखो होंठ तो 
बिल्कुल दादी या नानी पर हैं
अरे इसे तो दुनिया का देखो
कैसा ज्ञान है
अभी तो पैदा हुआ है
कैसे चंचलता से सबको देख रहा है
अरे देखो इसने तो 
रुपया कैसे कस के पकड़ा है
मगर क्या तुम इतना नहीं जानते
अभी तो मेरी ठीक से 
आँखें भी नहीं खुलीं
देखो तो
बंद है मेरी अभी तक मुट्ठी
बताओ कैसे तुमने 
ये लाग लपेट के जाल 
फैलाए हैं
कैसे मुझ मासूम पर
आक्षेप लगाये हैं 



मत घसीटो मुझको अपनी
झूठी लालची दुनिया में
रहने दो मुझे निश्छल 
निष्कलंक निष्पाप 

हाँ मैं अभी तो आया हूँ
तुम्हारी दुनिया में
मासूम हूँ मासूम ही रहने दो न
क्यों आस  के बीज बोते हो
क्यों मुझमे अपना कल ढूंढते हो
क्यों मुझे भी उसी दलदल में घसीटते हो
जिससे तुम न कभी बाहर निकल पाए
मत उढाओ मुझे दुनियादारी के कम्बल
अरे कुछ पल तो मुझे भी 
बेफिक्री के जीने दो 
बस करो तो इतना कर दो
मेरी मासूम मुस्कान को मासूम ही रहने दो............

लो फिर आ गयी छब्बीस बटा ग्यारह..........अब तो कुछ शर्म कर लो

लो फिर आ गयी
छब्बीस बटा ग्यारह
एक दिन का शोर शराबा
फिर वो ही मंजर पुराना
सब  कुछ भुला देना
चादर तान के सो जाना
क्या फर्क पड़ता है
मासूमों की जान गयी
क्या फर्क पड़ता है
जिनके घर ना 
अब तक जले चूल्हे
क्या फर्क पड़ता है
जिसकी बेटी रही अनब्याही
क्या फर्क पड़ता है
दूधमुंहे से छिन गयी ममता प्यारी
क्या फर्क पड़ता है
माँ की आँख का ना सूखा पानी
क्या फर्क पड़ता है
जिसके घर ना मनी दिवाली
क्या फर्क पड़ता है
सूनी माँग में ना भरी लाली
क्या फर्क पड़ता है
अपाहिज के जीवन को मोहताज हुआ
क्या फर्क पड़ता है
जब स्कूल जाने की उम्र में
थाम ली हो घर की चाबी
दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में
बेच दी हों किताबें सारी
पेट की आग बुझाने को
ज़िन्दगी से लड़ जाने को
बिटिया ने हो घर की
बागडोर संभाली
किसी को फर्क ना 
तब पड़ना था
ना अब पड़ना है
ये तो सिर्फ तारीख की 
भेंट चढ़ता कड़वा सच है
जिसे खून का घूँट 
समझ कर पीना है
जहाँ अँधियारा 
उम्र भर को ठहर गया है
जहाँ ना उस दिन से 
कोई भोर हुई
किसी को ना कोई फर्क पड़ना है 
दुनिया के लिए तो 
सिर्फ एक तारीख है
एक दिन की कवायद है
राजनेताओं के लिए 
श्रद्धांजलि दे कर्त्तव्य की
इतिश्री कर ली जाती है
उस बाप की सूखी आँखों में ठहरा
खामोश मंजर आज भी ज़िन्दा है
जब बेटे को कंधे पर उठाया था
उसका कन्धा तो उस दिन
और भी झुक आया था 
बदल जाएगी तारीख 
बदल जायेंगे मंजर
पर बूढी आँखों में ठहर गया है पतझड़
अब तो कुछ शर्म कर लो
ओ नेताओं ! मत उलझाओ 
कानूनी ताने बानों में
मत फेंको कानूनी दांव पेंचों को
दे दो कसाब को अब तो फाँसी
शायद आ जाये 
उस बूढ़े के होठों पर भी हँसी
मरने से पहले मिल जाये उसे भी शांति
माँ की आँखों का सूख जाए शायद पानी
या फिर उसकी बेवा की सूनी माँग में 
सूने जीवन में , सूनी आँखों में 
आ जाए कुछ तो लाली 
मत बनाओ इसे सिर्फ
नमन करने की तारीख
अब तो कुछ शर्म कर लो 
अब तो कुछ शर्म कर लो.................

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

काश मैं वसीयत कर पाती..........


काश मैं वसीयत कर पाती
कभी सोचा ही नहीं इस तरफ
आज सोचती हूँ तो लगता है
किस किस चीज की वसीयत करूँ
कौन सा सामान मेरा है
और बैठ गयी जमा घटा का हिसाब रखने
सबसे पहले तो बात की जाती है
धन दौलत की
और मैं सोच रही थी
कौन सी दौलत किसके नाम करूँ
रुपया पैसा तो मेरे पास नहीं
और ये कभी मैंने कमाया भी नहीं
और कमाती तो भी उसे क्या सहेजना
तो कौन सी दौलत किसके नाम करूँ
क्या अपने विचारों की दौलत
की भी कभी वसीयत की जाती है भला
और ये तो गली गली में पड़े मिलते हैं
वैसे भी जब आज इनका कोई मोल नहीं
तो इनकी वसीयत करने से क्या फायदा
कौन सहेजना चाहेगा
तो फिर कौन सी वस्तु है जिसकी
वसीयत की जा सकती है
आज ना कोई संस्कारों की खेती करता है
ना करना चाहता है
आउट डेटिड चीजों का कब मोल रहा है
तो क्या अपने लेखन की वसीयत करूँ
मगर क्यों और किसके नाम
ये भी तो हर जगह कचरे सा पड़ा दिखता है
इसका कहाँ कोई मोल लगाता है
फिर क्या है मेरे पास जिसकी वसीयत करूँ
मेरा दिल उसके भाव ही बचे
मगर उसे किसके नाम करूँ
बार बार हर तरफ देखा
उसे भी जो पास होकर दूर है और
उसे भी जो दूर होकर भी पास है
मगर फिर भी
बीच में एक गहरा आकाश है
वैसे भी आकाश को कब
किसने छुआ है
किसने उसको मापा है
जो आज मैं उस आकाश
पर एक सितारा अपने नाम का जडूँ
सारा हिसाब लगा लिया
हर गुना भाग कर लिया
जमा और घटा करके
सिर्फ सिफ़र ही हाथ लगा
और यही निष्कर्ष निकला
हर इन्सान की किस्मत
इतनी बुलंद नही होती 

कि वसीयत कर पाए
और फिर जहाँ सिर्फ
सिफ़र बचा हो वहाँ
शून्यों की वसीयतें नहीं की जातीं…………

मंगलवार, 22 नवंबर 2011

दर्द रोज कहाँ पिघलता है


आज आँसू की कलम बनाई है
दिल में कोई गमी छाई है
शायद मोहब्बत की कोई कली
कहीं फिर किसी ने चटकाई है
तभी तो दिल में इक हूक उठ आई है
पर वो पन्ना नहीं मिल रहा
जिस पर लिख सकती इबारत
बिन स्याही की कलम

लिखेगी भी तो क्या और कहाँ
शायद तभी पन्ने भी लापता हैं
आखिर दर्द की स्याही भी तो सूख चुकी है
सिर्फ़ कुछ सूखी पपडियाँ ही बची हैं
अब कितना ही भिगोना चाहो
दर्द रोज कहाँ पिघलता है
दर्द की पपडियों मे भी तो ज़ख्म पलते है
ये किसी ने ना जाना………

शनिवार, 19 नवंबर 2011

सम स्तर पर ही प्रकृति में संतुलन होता है


जानती हूँ चाहते हो तुम भी
अहिल्या बन जाऊँ मैं भी
तुम्हारे श्राप से श्रापित हो 
और जीवित पाषाण बन 
तुम्हारे दंभ की आहुति बन
भोग्या सामग्री सम 
जीवन यज्ञ में पाषाण को 
अमरत्व प्रदान करूँ
मगर मूक बधिर की भांति 
पाषाण जो सब सहता है
आंधी, पानी ,धूप, बारिश
तूफ़ान, झंझावत
मगर ज़ख्मों को उसके 
कौन सहलाता है 
जानती हूँ तुम्हारे मन के 
पौरुषिक अवलंबन को
जिसमे आज भी गौतम का 
प्रतिबिम्ब ही समाया है
क्रोधाग्नि में दग्ध तुम्हारा
आहत पौरुष कभी 
नहीं जान पाया सत्य को
या शायद जान कर अन्जान बनना 
तुम्हारी नियति है
युगों की परम्परों से 
तुम कैसे मुक्त हो सकते हो
मगर बिना दोष आखिर कब तक
मैं अहिल्या बन श्रापित होती रहूंगी
कब तक झूठे रिवाजों की भेंट चढ़ती रहूंगी
आखिर कब तक ना किये अपराधों का
अनचाहा बोझ उठाती रहूंगी
अब तोडती हूँ हर श्लाघा 
जो तुमने मेरे चारों तरफ बनाई थी
शायद यही तुम्हें नहीं भाती है
तभी तुम टूटते समीकरण देख बौखला जाते हो
और एक बार फिर उन्ही अंधे कुओं  की तरफ 
मुझे धकेलते हो 
कभी डराकर तो कभी फुसलाकर
कभी समाज का भय दिखाकर 
तो कभी मुझे बेबस जान 
मेरा और कोई ठिकाना नहीं
सिवाय तुम्हारे 
है ना ..............यही सच
मगर एक बार बढे कदम को
इस बार नहीं मुड़ने दूंगी
इस बार इतिहास खुद को नहीं दोहराएगा
अब नहीं बनूंगी दोबारा अहिल्या 
बेशक तुम्हें पाषाण बना दूं
मगर अब नहीं दूंगी अनचाही क़ुरबानी 
सिर्फ तुम्हारे झूठे दंभ को पोषित करने के लिए 
एक बार तुम भी तो उतरकर देखो
एक बार तुम भी तो जलकर देखो
इस आग में ....................
शायद तब जानोगे परित्यक्ता का दर्द
शायद तब जानोगे पाषाण होना क्या होता है 
सम स्तर पर ही प्रकृति में संतुलन होता है 

रविवार, 13 नवंबर 2011

उडान तो आसमां की तरफ़ ही होती है ना……………

अजनबी मोड
अजनबी मुलाकात
जानकर भी अन्जान
पता नही वजूद जुदा हुये थे
या …………
नहीं , आत्मायें कभी जुदा नही होतीं
वज़ूद तो किराये का मकान है
और तुम और मै बताओ ना
वजूद कब रहे
हमेशा ही आत्माओ से बंधे रहे
अब चाहे कितनी ही 
बारिशें आयें
कितने ही मोड अजनबी बनें
कितनी ही ख्वाहिशें दम निकालें
और चाहे चाय के कप दो हों 
और उनमे चाहे कितना ही 
पानी भर जाये
देखना प्यार हमेशा छलकता है
वो कब किसी कप मे
किसी बारिश की बूंद मे
या किसी फ़ूल मे समाया है
वो तो वजूद से इतर
दिलो का सरमाया है
फिर कैसे सोचा तुमने
हम जुदा हुये
हम तो हमेशा 
अलग होते हुये भी एक रहे
एक आसमां की तरह
एक पंछी की तरह
कहीं भी रहे 
उडान तो आसमां की तरफ़ ही होती है ना……………

शनिवार, 5 नवंबर 2011

दोस्ती , प्रेम और सैक्स

दोस्ती अलग है 
प्रेम अलग है
सेक्स अलग है
किसी ने कहा मुझे
क्या कर सकती हो व्याख्या ?
बता सकती हो
क्या हैं इनके अस्तित्व?
क्या ये हैं समाये इक दूजे में
या हैं इनके भिन्न अस्तित्व?


दो विपरीत लिंगी 
दोस्ती हो या प्रेम 
हमेशा कसौटी पर ही 
खड़ा पाया जाता है
क्यूँ समझ नहीं आ पाता है
दोस्ती का जज्बा 
नेमत खुदा की
जिसको नवाज़ा है 
होगा कोई बाशिंदा 
जहान से अलग
खुदा के नज़दीक
यूँ ही तो खुदा को
उस पर नहीं प्यार आया है
मगर विपरीत लिंगी दोस्ती 
पर ही क्यूँ आक्षेप लगाया है
क्यूँ नहीं किसी को समझ आया है
हर दोस्ती की बुनियाद 
सैक्स नहीं होती
इमारत इतनी कमजोर नहीं होती
महज़ शारीरिक आकर्षण 
और स्त्री पुरुष का संग ही 
क्यूँ ये दर्शाता है 
यहाँ तो सिर्फ इनका
शारीरिक नाता है
देह से इतर भी 
सम्बन्ध होते हैं
जो प्रेम से भी गहरे होते हैं
फिर चाहे हो कृष्ण
सखी तो एक ही बन पाई थी
पांचाली ने भी  तो 
दोस्ती कृष्ण संग निभाई थी
पर वहाँ प्रेम दिव्यता पा गया था
दोस्ती की रस्में निभा गया था

प्रेम की डोर 
बड़ी कच्ची होती है
इसमें ना कोई कड़ी होती है
अदृश्य तरंगों पर 
ह्रदय तरंगित होते हैं
बिन देखे , बिन मिले
बिन जाने भी 
भाव स्खलित होते हैं
प्रेम में स्त्री पुरुष 
कब चिन्हित होते हैं
वहाँ तो आत्माओं 
के ही मिलन होते हैं
फिर कैसे भेद करूँ 
स्त्री पुरुष को अलग करूँ
फिर चाहे गोपी भाव 
में समाहित हो
जहाँ कृष्ण गोपी बन जाता हो
या गोपी कृष्ण बन जाती हो
पर प्रेम की थाह ने कोई पाता है
प्रेम तो ह्रदय की वीथियों 
पर लिखा अनवरत नाता है
जिसकी गहराइयों में 
जिस्म से परे सिर्फ 
आत्मिक मिलन ही हो पाता है 
जो हर किसी को ना आता है
और वो प्रेम को भी
शरीरों के मिलन से ही
तोल पाता है 
मगर अपनी जड़ सोच से
ना मुक्त हो पाता है
सिर्फ स्त्री पुरुष रूप में ही
परिभाषित किया जाता है
मगर कभी उसकी दिव्यता को 
ना जान जाता है
तभी प्रेम कभी भी 
अपना मुकाम ना पा पाता है
इक बार स्त्री पुरुष भेद से बाहर आओ
खुद को प्रेम के सागर में डुबा जाओ
तो शायद तुम भी प्रेमग्रंथ लिख जाओ



दो विपरीत लिंगी मिलन
महज सम्भोग को ही
दर्शाता है
सिर्फ देह से शुरू होकर
देह तक ही सिमट जाता है
कभी देह से इतर 
ना इक दूजे का जान पाता है
और बीच राह में ही 
बँधन चटकता जाता है
जब तक ना आपसी
सौहार्द हो 
तब तक कैसे ढाई अक्षर 
का आधार हो
सम्भोग का कैसे श्रृंगार हो
जब तक ना मित्रमय 
वातावरण का विचार हो
जब तक ना प्रेम के बीज का 
ना रोपण हो
कैसे कहो तो सम्भोग हो
सम्भोग मात्र क्रिया नहीं
जीवन दर्शन समाया है
सम्भोग से भी अध्यात्म तक
मार्ग बताया है
पर वहाँ देह से इतर ही
सम्बन्ध बन पाया है
सिर्फ कुछ पलों का सामीप्य ही 
ना दीवार बने 
मानस के मन का मजबूत आधार बने
जहाँ एक दूजे में ही 
प्रेमी, सखा ,आत्मीय,
ईश्वरीयतत्व 
सबका दर्शन हो जाए 
तन से परे मन का मिलन हो जाये
तो सम्भोग पूर्णता पा जाये
तभी शायद विपरीत लिंगी होना
सिर्फ एक रूप रह जायेगा
सम्भोग में भी दोस्ती और प्रेम का 
आधार नज़र आएगा
और संपूर्ण दिव्यता को मानव पा जायेगा

यूँ तो दोस्ती , प्रेम और सैक्स
तीनो अपने मानदंडों पर खरे उतरते हैं
पर इनके अस्तित्व भी
इक दूजे में ही समाहित होते हैं
जहाँ बिना दोस्ती के 
प्रेम ना जगह पाता है
और बिना प्रेम और दोस्ती के
सम्भोग का कारण ना
उचित नज़र आता है
फिर कैसे इन्हें अलग करूँ
अलग होते हुए भी
इनके अस्तित्व इक दूजे बिन
ना पूर्णता पाते हैं 
हाँ ...........अलग अस्तित्व
तभी सम्पूर्णता पाते हैं
जब इक दूजे में सिमट जाते हैं
मगर वहाँ  वासनात्मक 
राग ना बहता है
सिर्फ अनुराग ही अनुराग होता है
सर्वस्व  समर्पण जहाँ होता है
वो ही प्रेम हो या दोस्ती या सैक्स
सभी का आधार होता है
शायद वहीँ दिव्यता का भान होता है 



दोस्तों ये फ़ोटो गुंजन जी के ब्लोग से ली है जो इस रचना पर खरी उतर रही है आभारी हूँ गुंजन जी की।

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

क्या जरूरी है हर बार त्याग राम ही करे............300

सर्वस्व समर्पण किया था तुम्हें
सात फेरों के सात वचनों के साथ
सात जन्म के लिए 
बांध ली थी तुम संग जीवन डोर
उम्र की सीढियां चढ़ती रही
रोज एक नयी आग सुलगती रही
अपना प्रेम अपना विश्वास अपना वजूद
सब तुम पर ही लाकर ठहरा दिया था
और तुम्हारे लिए
मेरा वजूद क्या था
या क्या है
बस यही ना जान पाई
सिर्फ तन का ही संगम हुआ
जीवन भागीरथी में
कभी मतभेद बढे 
तो कभी चाहतें परवान चढ़ीं
कभी तुम्हारे फरेब ने 
आत्मा को कचोट दिया
कभी तुम्हारे झूठ ने 
मुझे छलनी किया
फिर भी सात जन्मों के बँधन 
की हर रस्म निभाती रही
कभी मन से तो कभी तन से
और था भी क्या मेरे पास
सिवाय मन और तन के
मगर तुम्हारे अहम् ने
हर जगह मुझे प्रताड़ित किया
फिर भी ना उफ़ किया
लेकिन नहीं पता था 
तुम अपने अहम् को 
पोषित करने के लिए
हर सीमारेखा लाँघ जाओगे
जिसमे मेरे वजूद को भी
ढहा जाओगे 
मेरे स्वाभिमान की लाश पर
अपने नपुंसक अहम् की 
दीवार खडी कर जाओगे
एक सीमा होती है ना
सागर की भी 
उसमे भी सुनामियां आती हैं 
जब समवायी हद से बाहर हो जाये
और लगता है शायद
अब वो वक्त आ गया है
आखिर कब तक  तुम्हारे 
तुच्छ अहम् की खातिर 
खुद की आहुति देती
एक ही चीज  तो मेरी अपनी थी
मेरा स्वाभिमान..................
और तुमने उसे भी रौंद  दिया
सिर्फ गैरों की खातिर
और अपने अहम् के पोषण के लिए
असत्य संभाषण का सहारा लिया
कहो कब तक और क्यों 
तुम्हारी ही खातिर जीती रहूँ
और बेइज्जती के कडवे घूँट पीती रहूँ
इसलिए आज एक निर्णय ले ही लिया
वरना शायद खुद की नज़रों में गिरकर
जीना आसान नहीं होता
मैंने तुम्हें रस्मो रिवास के 
हर बँधन से मुक्त किया
अब ना तुम से
तन का रिश्ता रहा ना मन का
लो मैंने पानी पर दीवार बना दी है
इस पार मेरा जहान
उस पार तुम्हारा
एक छत के नीचे रहते हुए भी
जो दिखाई नहीं देतीं
वो अदृश्य दीवारें बहुत मजबूत होती हैं
हाँ मैंने आज तुम्हें तन और मन से त्याग दिया है
क्या जरूरी है हर बार त्याग राम ही करे
लो आज सीता ने तुम्हारा त्याग किया ................