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मंगलवार, 26 जून 2012

देखा है कभी राख़ को घुन लगते हुए ........?



नारी के दृष्टिकोण से


सुना है नारी
सम्पूर्णता तभी पाती है
जब मातृत्व सुख से 
आप्लावित होती है
जब यशोदा बन
कान्हा को 
दुग्धपान कराती है
रचयिता की 
अनुपम कृति तब होती है

यूँ तो उन्नत वक्षस्थल
सौंदर्य का प्रतिमान होते हैं
नारी का अभिमान होते हैं
नारी देहयष्टि में
आकर्षण का स्थान होते हैं
पुरुष की कामुक दृष्टि में
काम का ज्वार होते हैं
मगर जब इसमें घुन लग जाता है
कोई रेंगता कीड़ा घुस जाता है
सारी फसल चाट जाता है
पीड़ा की भयावहता में 
अग्निबाण लग जाता है
असहनीय दर्द तकलीफ
हर चेहरे पर पसरा खौफ
अन्दर ही अन्दर 
आतंकित करता है 
कीटनाशक का प्रयोग भी
जब काम ना आता है
तब खोखले अस्तित्व को
जड़ से मिटाया जाता है
जैसे मरीज को 
वैंटिलेटर पर रखा जाता है
यूँ नारी का अस्तित्व 
बिना घृत के
बाती सा जल जाता है
उसका अस्तित्व ही तब
उस पर प्रश्नचिन्ह लगाता  है
एक अधूरापन सम्मुख खड़ा हो जाता है
सम्पूर्णता से अपूर्णता का 
दुरूह सफ़र 
बाह्य सौन्दर्य तो मिटाता है
साथ ही आंतरिक 
पीड़ा पर वज्रपात सा गिर जाता है

जिस अंग से वो
गौरान्वित होती है
साक्षात वात्सल्य की 
प्रतिमूर्ति होती है
जो उसके जीवन की
उसके अस्तित्व की
अमूल्य धरोहर होती है
नारीत्व की पहचान होती है
जब नारी उसी से विमुख होती है
तब प्रतिक्षण काँटों की
शैया पर सोती है

बेशक नहीं होती परवाह उसे
समाज की 
उसकी निगाहों की
किसी भी हीनता बोध की 
सौंदर्य के अवसान की
अन्तरंग क्षणों में उपजी
क्षणिक पीड़ा की
क्योंकि जानती है
पौरुषिक स्वभाव को
क्षणिक आवेग में समाई निर्जनता
पर्याय ढूँढ लेती है
मगर 
स्वयं का अस्तित्व जब
प्रश्नचिन्ह बन 
खड़ा हो जाता है
तब कोई पर्याय ना नज़र आता है
आईना भी देखना तब
दुष्कर लगता है

नहीं भाग पाती 
अपूर्ण नारीत्व से 
स्वयं को बेधती 
स्वयं की निगाह से
हर दंश , हर पीड़ा 
सह कर भी 
जीवित रहने का गुनाह
उस वक्त बहुत कचोटता है
जब मातृत्व उसका 
अपूर्ण रहता है
बेशक दूसरे सुखो से 
वंचित हो जाए
तब भी आधार पा लेती है
मगर मातृत्व सुख की लालसा 
खोखले व्यक्तित्व पर
प्रश्नचिन्ह बन 
जब खडी हो जाती है
वात्सल्य की बलि वेदी पर
माँ का ममत्व 
नारी का नारीत्व 
प्रश्नवाचक नज़रों से 
उसे घूरता है
मृत्युतुल्य कष्ट सहकर
ज़िन्दा रहना उसे
उस वक्त दुष्कर लगता है 
जब ब्रैस्ट कैंसर की
फैली शाखाओं के व्यूह्जाल 
को तोड़ वो खुद को निरखती है 
तब ज़िन्दा रहना अभिशाप बन
उसके संपूर्ण व्यक्तित्व को
अभिशापित कर देता है
जो वास्तविक कैंसर से 
ज्यादा भयावह होता है

अपूर्ण व्यक्तित्व के साथ जीना
मौत से पहले पल- पल का मरना 
उसे अन्दर ही अन्दर 
खोखला कर देता है 
मातृत्व में घुला संपूर्ण नारीत्व 
पूर्ण नारी होने की गरिमा
उसके मुखकमल के तेज को 
निस्तेज कर देती है 
जब अपूर्णता की स्याही उसकी आँखों में उतरती है

चंद लफ़्ज़ों में 
उस भयावहता को बाँधना संभव नहीं
दर्द की पराकाष्ठा का चित्रण संभव नहीं
ये तो कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है 
मगर लफ़्ज़ों में तो ना
वो भी व्यक्त कर सकता है 
क्योंकि 
मौत से आँख मिलाने वाली
खुद से ना आँख मिला पाती है  
यही तो इस व्याधि की भयावहता होती है 


कहना आसान होता है 
बच्चा गोद ले लो 
किसी अनाथ को प्रश्रय दो 
जीने के नए बहाने ढूंढो 
मगर जिस पर गुजरती है 
वो ही पीड़ा को जानता है 
जब खुद के सक्षम होने से 
असक्षम होने के सफ़र को 
वो तय करता है 
और एक फांस सी दिल पर 
उम्र भर के लिए गड जाती है 
जब उस सुख से वो वंचित रह जाती है 


यूँ ज़िन्दगी से बढ़कर कोई नेमत नहीं होती 
जानती है वो ......
फिर भी एक नवान्गना/तरुणी  के जीवन की सम्पूर्णता 
तो सिर्फ मातृत्व में है होती 
सोच खुद को निरीह महसूसती है 
एक प्रश्नचिन्ह उसके वजूद को 
धीमे - धीमे खाता जाता है 
जिसका उत्तर ना किसी को कहीं मिल पाता है 
एक ऐसी बेबसी जिसका निदान न मिल  पाता है 
और उसे अपना अस्तित्व अपूर्ण नज़र आता है 
और चीत्कार उठता है उसका अंतस बेबसी से उपजी पीड़ा से 


देखा है कभी राख़ को घुन लगते हुए ........?




पुरुष के दृष्टिकोण से 



जब से विषबेल अमरलता से लिपटी है
मेरे अंतस में भी मची हलचल है
यूँ तो प्रणय का ठोस स्तम्भ होते हैं
मगर जीवन के पहिये सिर्फ 
इन्ही पर ना टिके होते हैं

ये भी जानता हूँ मैं 
अंग में उपजी पीड़ा की भयावहता को 
तुम्हारे ह्रदय की टीस को 
पहचानता हूँ 
संघर्षरत हो तुम 
ना केवल व्याधि से
ना केवल अपने अस्तित्व के खोखलेपन से
बल्कि नारीत्व के अधूरेपन से भी
जो तुम नहीं कहती हो
वो भी दिख रहा है मुझे
तुम्हारी वेदना का हर शब्द
मेरे भीतर रिस रहा है

मकड़ी के जालों ने तुम्हें घेरा है
खोखला कर दिया है तुम्हारा वजूद
कष्टसाध्य पीड़ा के आखिरी पायदान 
पर खडी तुम
अब भी मेरी तरफ 
दयनीय नेत्रों से देख रही हो
सिर्फ मेरे लिए
मेरे स्वार्थ के लिए
मेरी क्षणभंगुर तुष्टि के लिए
सोच रही हो
कैसे गुजरेगा जीवन
अधूरेपन के साथ
मगर तुम अधूरी कब हुईं
तुम तो हमेशा पूरी रही हो 
मेरे लिए 

नहीं प्रिये ...........नहीं
इतना स्वार्थी कैसे हो सकता हूँ
जीवन के दोनों पहियों के बिना 
कैसे गाड़ी चल सकती है
क्या तुमने मुझे सिर्फ इतना ही जाना
क्या मुझे सिर्फ 
विषयानल में फँसा दलदल का 
रेंगता कीड़ा ही समझा
जो अपनी चाहतों के सिवा
अपने रसना के स्वाद के सिवा
ना दूजे की पीड़ा समझता है
नहीं ..........ऐसा संभव नहीं 

क्या हुआ गर 
ज़हरवाद ने तुम्हें विकृत किया है
क्या सिर्फ एक अंग तक ही 
तुम्हारा अस्तित्व सिमटा है
तुम एक संपूर्ण नारी हो
गरिमामयी ओजस्वी 
अपने तेज से जीवन को 
आप्लावित करतीं 
घर संसार को संभालतीं 
अपनी एक पहचान बनातीं 
ना केवल अपने अर्थों में
बल्कि समाज की निगाह में 
संपूर्ण नारीत्व को सुशोभित करतीं
क्या सिर्फ अंगभंग होने से
तुम्हारी जगह बदल जाएगी 
नहीं प्रिये .........नहीं

जानती हो 
ये सिर्फ मन का भरम होता है 
रिक्त स्थानों की पूर्ति के लिए
प्रेम का अमृत ही काफी होता है 
जहाँ प्रेम होता है वासना नहीं 
वहाँ फिर कोई स्थान ना रिक्त दिखता है 
क्योंकि यथार्थ से तो अभी वास्ता पड़ता है 


शायद नहीं यक़ीनन
यही तो प्रणय संबंधों का चरम होता है 
जहाँ शारीरिक अक्षमता ना 
संबंधों पर हावी होती है 
और संबंधों की दृढ़ता के समक्ष 
मुखरित व्याधि भी मौन हो जाती है 



शनिवार, 23 जून 2012

बस कहानियों की खुरचन बच जाती है





अकाल

जिसमे नही कोई काल

काल तो खुद

काल कवलित हो गया

सिर्फ़ एक दृश्य

बाकी रहता है

जो मूँह जोये 
खडा रहता है
और अपनी बरबादी पर
खुद ही अट्टहास करता है
कल तक जहाँ दरिया बहा करते थे
आज वहाँ एक बूँ द पानी 
भी खुद को ना देख पाता है
छातियाँ धरती की ही नही फ़टतीं
हर छाती पर इतनी गहरी दरारें
उभर आती हैं जिसमे
सागर का पानी भी कम पड जाता है
आकाश की आग तो धरती सह लेती है
पर उस आग की तपिश ना सह पाती है
जिसमे मासूम ज़िन्दगियां झुलस जाती हैं
फ़ाकों पर इंसान तो रह लेता है
पर बेजुबान जानवरों की तो जान पर बन आती है

वक्त की तपती आँच पर जलते
बेजुबानों की सिसकती आवाज़
बिल से बाहर रेंगने लगती है

ना धरती पर जगह मिलती है

ना आकाश ही हमदर्दी दिखाता है

घर ,आँगन ,नदी ,तालाब ,पोखर
कच्ची- पक्की पगडंडियाँ
सूखे झाड- खंखाड 
उजाड बियाबान बस्ती 
बिना किसी आस के
शमशान मे तब्दील हो जाती हैं
एक जलता रेगिस्तान 
बाँह पसारे सबको 
स्वंय मे समाहित कर लेता है

हर चूल्हे की आग तो जैसे

हवाओं मे बिखर जाती है

तवों की ठंडक हड्डियों मे उतर आती है

और लाशों मे तब्दील हो जाती है

उस अकाल मे काल भी झुलस जाता है

सिर्फ़ राख का ढेर ही नज़र आता है
बस कहानियों की खुरचन बच जाती है
धरती का सीना उधेडती हुयी
किसी तश्तरी मे भोज सामग्री उँडेलती हुयी
अकाल का ग्रास बनती हुयी …………




बुधवार, 20 जून 2012

तुम्हारी पहली मौसमी आहट


जानते हो 

एक अरसा हुआ 

तुम्हारे आने की

आहट सुने 

यूँ तो पदचाप 

पहचानती हूँ मैं

बिना सुने भी 

जान जाती हूँ मैं 

मगर मेरी मोहब्बत

कब पदचापों की मोहताज हुई

जब तुम सोचते हो ना

आने की 

मिलने की

मेरे मन में जवाकुसुम खिल जाता है 

जान जाती हूँ 

आ रहा है सावन झूम के

मगर अब तो एक अरसा हो गया

क्या वहाँ अब तक 

सूखा पड़ा है

मेघों ने घनघोर गर्जन किया ही नहीं

या ऋतु ने श्रृंगार किया ही नहीं 

जो तुम्हारा मौसम अब तक 

बदला ही नहीं 

या मेरे प्रेम की बदली ने 

रिमझिम बूँदें बरसाई ही नहीं

तुम्हें प्रेम मदिरा में भिगोया ही नहीं 

या तुम्हारे मन के कोमल तारों पर

प्रेम धुन बजी ही नहीं 

किसी ने वीणा का तार छेड़ा ही नहीं

किसी उन्मुक्त कोयल ने 

प्रेम राग सुनाया ही नहीं

कहो तो ज़रा

कौन सा लकवा मारा है 

कैसे हमारे प्रेम को अधरंग हुआ है

क्यूँ तुमने उसे पंगु किया है

हे ..........ऐसी तो ना थी हमारी मोहब्बत

कभी ऋतुओं की मोहताज़ ना हुई

कभी इसे सावन की आस ना हुई

फिर क्या हुआ है 

जो इतना अरसा बीत गया 

मोहब्बत को बंजारन बने 

जानते हो ना ...........

मेरे लिए सावन की पहली आहट हो तुम

मौसम की रिमझिम कर गिरती

पहली फुहार हो तुम

मेरी ज़िन्दगी का 

मेघ मल्हार हो तुम 

तपते रेगिस्तान में गिरती

शीतल फुहार हो तुम 

जानते हो ना...........

मेरे लिए तो सावन की पहली बूँद 

उसी दिन बरसेगी 

और मेरे तपते ह्रदय को शीतल करेगी

वो ही होगी 

मेरी पहली मोहब्बत की दस्तक

तुम्हारी पहली मौसमी आहट

जिस दिन तुम 

मेरी प्रीत बंजारन की मांग अपनी मोहब्बत के लबों से भरोगे ...........

रविवार, 17 जून 2012

बस ऐसे ही तो थे मेरे बाबूजी



कोई ऐसा रिश्ता होता है
कोई ऐसा नाता होता है
जो बिछड़ कर भी ना बिछड़ता है
बस यादों में टीसता रहता है
आँख नम कर जाता है
वो स्नेह दुलार तड़पाता है
निस्वार्थ प्रेम की पराकाष्ठा पर
उच्च स्थान पाता है
शब्दों में व्यक्त ना होता है
सिर्फ आँख की नमी की धरोहर होता है
बिन कहे सब कह जाता है
यूँ दुनिया की उलझनों में उलझे रहते हैं
सबको भूले रहते हैं
मगर एक दिन ही सही
वो रिश्ता हमें बुलाता है
अपनी यादें दे जाता है
बहुत कुछ बदल जाता है
यादों से ना मुक्ति देता है
हाँ ........बेटी का पिता से ऐसा नाता होता है




नहीं याद कर पाती
ज़िन्दगी की भाग दौड़ में फँसी
उलझनों में उलझी
एक सीधी रेखा नहीं रहती
बन जाती हूँ 
माँ पत्नी बहन
बस नहीं रहती तो सिर्फ .......बेटी
अपने बाबूजी की बेटी

उनकी आँख का तारा
सहेजा था जिसे बड़े लाड़ से
आँच नहीं आने दूँगा
तेरे हक़ के लिए
ज़माने सा लड़ जाऊँगा
मगर आँख में ना आँसू आने दूँगा
ऐसा कहने वाले 
पंखों को परवाज़ देने वाले
सदा चुप रहने वाले
मगर बेटी के लिए भाव विह्वल हो जाने वाले
ऐसे ही तो थे मेरे बाबूजी

नहीं कर पाती कुछ भी
रो भी नहीं पाती 
याद आती है कभी कभी
बहुत ज्यादा 
पर किससे कहूं ?
पी लेती हूँ आँसुओं को 
और जी लेती हूँ 
जीना जरूरी है ना ........
जब से गए हैं 
आँगन ही छूट गया
मेरा हर अवलंबन टूट गया
वो स्नेह की गागर उँडेलती आँखें
अब कहीं नहीं दिखतीं
तरसती है रूह मेरी
क्योंकि जानती है ना
पिता का प्रेम निस्वार्थ था 
लाड़ -  दुलार में माँ से ना कम था 
दिल तो उनमे भी वैसा ही था 
बस व्यक्त नहीं कर पाते थे
अपने स्नेह को आँखों से ही जताते थे
बेटी के कांटा लगने पर
स्वयं घायल हो जाते थे
जिन्होंने जीवन से लड़ना सिखाया
कैसे जीना है ये बतलाया
कदम कदम पर राह दिखाई
अपने अनुभवों की पोटली मुझे पकडायी
कैसे ना याद आयें मुझे
त्याग और स्नेह की मूरत 
बस ऐसे ही तो थे मेरे बाबूजी 
आज याद बहुत आये ........मेरे बाबूजी 

शनिवार, 16 जून 2012

इबादत के पन्ने लफ़्ज़ों के मोहताज नहीं होते ............

सुनो
तुम लिख रहे हो ना ख़त
मेरे नाम ..........जानती हूँ
देखो ना ..........स्याही की कुछ बूँदें
मेरे पन्नों पर छलछला आयी हैं
सुनो
देखो मत लिखना ........विरहावली
वो तो बिना कहे ही 
मैंने भी है पढ़ी
और देखो 
मत लिखना .........प्रेमनामा
उसके हर लफ्ज़ की रूह में 
मेरी सांसें ही तो सांस ले रही हैं
फिर किसके लिए लिखोगे
और क्या लिखोगे 
बताओ तो सही 
क्यूँ लफ़्ज़ों को बर्बाद करते हो
क्यूँ उनमे कभी दर्द की 
तो कभी उमंगों की टीसें भरते हो
मोहब्बत के सफरनामे पर 
हस्ताक्षरों की जरूरत नहीं होती
ये दस्तावेज तो बिना जिल्दों के भी
अभिलेखागार में सुरक्षित रहते हैं 
और शब्दों की बयानी की मोहताज़ 
कब हुई है मोहब्बत
ये तो तुम जानते ही हो 
फिर क्यूँ हवाओं के पन्नों पर
संदेशे लिखते हो
ना ना .............नहीं लिखना है हमें
नहीं है अब हमारे पहलू में जगह
किसी भी वादी में बरसते सावन की
या बर्फ की सफ़ेद चादर में ढके 
हमारे अल्फाज़ नहीं है मोहताज़
पायल की झंकारों के 
किसी गीत या ग़ज़ल की अदायगी के
बिन बादल होती बरसात में भीगना
बिन हवा के सांसों में घुलना
बिन नीर के प्यास का बुझना
और अलाव पर नंगे पैर चलकर भी
घनी छाँव सा सुख महसूसना
बताओ तो ज़रा .......
जो मोहब्बत की इन राहों के मुसाफिर हों
उन्हें कब जरूरत होती है 
संदेशों के आवागमन की 
कब जरूरत होती है 
उन्हें पन्नों पर उकेरने की
क्यूँकि वो जानते हैं 

इबादत के पन्ने लफ़्ज़ों के मोहताज नहीं होते ............



बुधवार, 13 जून 2012

"सम्मान का मदारी" कैसे "ब्लोगर्स को बन्दर" बना नचाता है


कहने वाले कहते हैं 
सम्मानों की श्रृंखला में 
जेंडर से क्या होता है
अच्छा लिखना चाहिए
फिर चाहे पहले तीन में महिला ना हो
मगर महिला का वोट मिलना चाहिए
खुद को साबित करने के लिए
नए हथकंडे अपनाते हैं
कहीं महिला को अपमानित करते हैं
तो कहीं वोटिंग करवाते हैं
यूँ अपने ब्लॉग को फेमस करवाते हैं
ये वोटिंग भी अजब खेल दिखाती है
किसी को अर्श पर तो किसी को 
फर्श पर पहुंचाती है
सही तथ्य नहीं जुटाती है
आकलन में भी भरमाती है
मगर वोट के लालच में 
सब ब्लोगरों को फँसाती है
स्वयं को साबित करने को
फिर ब्लोगर तिकड़म लडाता है
कभी पोजिटिव तो कभी नैगेटिव   
ब्लोगर सम्मान आयोजित करता है 
और खुद को सर्वेसर्वा सिद्ध करता है
खुद को खुदमुख्तार बताता है 
बाकी ब्लोगरों की हमदर्दी पाता है
यूँ अपने को महान सिद्ध करवाता है

हाय रे! ये सम्मान कैसे कैसे कमाल दिखाता है 
जब चींटियों के भी पर निकलवाता है 
बरसाती कुकुरमुत्ते उग आते हैं
और बरसात के बाद गायब हो जाते हैं
जो हर मौसम में ना पाए जाते हैं
ऐसे विलुप्त प्राणी होते हैं
मगर थोड़े समय के लिए सक्रिय हो जाते हैं
बाकी ब्लोगरों के अरमान धो जाते हैं
सच कहने से हर ब्लोगर मुँह चुराता है
सम्मान के क़र्ज़ तले जो दब जाता है 
गर कोई कहने की हिम्मत करे 
तो ये विलुप्त प्राणियों की सक्रियता
जीना मुश्किल करती है 
और आंकड़ों के खेल में एक बार फिर
सच्चा ही मात खाता है 
दूसरे को नीचा दिखाने वाला ही 
उच्च स्थान पाता है
मगर सम्मान पर ना कोई आँच आती है
और ब्लोगिंग यूँ ही की जाती है
जहाँ किसी की टांग खींची जाती है
किसी को नीचे गिराया जाता है 
और खुद का सम्मान कराया जाता है
ये कूदफ़ांद केवल सम्मान आयोजन तक ही चलती है 
उसके बाद तो किसी की ना खबर मिलती है 
सब गधे के सिर से सींग जैसे गायब हो जाते हैं 
मगर जब तक रहते हैं खूब हो-हल्ला मचाते हैं
सम्मान और सम्मानितों की अच्छी ऐसी तैसी करते हैं

तभी तो स्वतंत्र लेखन की महिमा अति प्यारी है 
जिसमे मन की बात हर कोई कह जाता है
कोई हास्य मे तो कोई व्यंग्य मे 
तो कोई सीधा तमाचा लगाता है
मगर ब्लोगिंग के सीने पर मूंग तो दल ही जाता है 
यूँ ब्लोगिंग इतिहास बनाती है
एक दिन का बादशाह बनाती है
फिर चाहे बाकी दिन धूल चटाती है 
सम्मान की तर्ज़ पर कैसे कैसे खेल दिखाती है
"सम्मान का मदारी" कैसे "ब्लोगर्स को बन्दर" बना नचाता है 
ये इस आयोजन में ही नज़र आता है 
फिर भी हाथ में ट्राफी ले हर ब्लोगर मुस्कुराता है 
बस यही ब्लोगिंग और सम्मानों की लीला न्यारी है 
जिसमे उलझा हर चिट्ठाकारी है :)))))))))