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बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

बदलती सोच के नए अर्थ के ये हैं कुछ सोपान

ये हैं कुछ झलकियाँ विश्व पुस्तक मेले की जहाँ मैं , अपने प्रथम संग्रह " बदलती सोच के नए अर्थ " और अपने सभी मित्रों के साथ ……… तबियत खराब होने की वजह से देर से आपके सामने आ पायी हूँ …………एक सुखद अहसास से भरपूर समय रहा जहाँ जाने कितने जाने और अनजाने मित्रों से मिलना हुआ मानो दूरियाँ सिमट गयी हों और एक जगह केन्द्रित हो गयी हों 


























 कुछ झलकियाँ और आपकी प्रतीक्षा में हैं ………सभी मित्रों से मिलना, उनके द्वारा उत्साहवर्धन किया जाना और उनके द्वारा पुस्तक खरीद कर पढे जाने की ज़िद ने इस बार पुस्तक मेले को एक नया आयाम दिया फिर चाहे वो बडे बडे साहित्यकार ही क्यों ना हों जो बताता है कि एक नयी परम्परा की तरफ़ आज की पीढी ने एक नया कदम रख दिया है और कोई शक नहीं कि आने वाला कल कविता के भविष्य को उज्ज्वलता प्रदान करेगा




















और अब सबसे जरूरी बात : 

जिसके अपरिमित सहयोग के बिना मेरी बुक आपको इस बार के पुस्तक मेले में दिख ही नही सकती थी तो वो है बेहद सहज , सरल और निश्छल हिंद युग्म के संचालक शैलेष भारतवासी जिसको शुक्रिया अदा करने के लिये मेरे पास शब्द ही नहीं हैं क्योंकि मेरे प्रकाशक का तो स्टाल इस मेले में था नही और ऐसे में किसी और प्रकाशक की पुस्तक को अपने स्टाल पर स्थान देना शैलेष के अद्भुत और बडे दिल वाले व्यक्तित्व को ही दर्शाता है और मेरे पास ऐसे कोई शब्द नहीं जिनसे मैं शैलेष का शुक्रिया अदा कर सकूँ बस उसके लिये हर पल दिल से सिर्फ़ और सिर्फ़ दुआयें ही निकल रही हैं और चाहती हूँ मेरे सभी दोस्त उसके लिये दुआओं का ये सिलसिला कायम रखें मेरे साथ 


बाकी और सूचनायें और फ़ोटो बाद में :)

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

इंतज़ार की घड़ियाँ ख़त्म हुयीं

दोस्तों



इंतज़ार की घड़ियाँ ख़त्म हुयीं और हाजिर है " हिन्दी अकादमी दिल्ली " से स्वीकृत मेरी पुस्तक मेरी पुस्तक " बदलती सोच के नए अर्थ " आपके अपने जाने माने प्रकाशन हिन्द युग्म पर

हाल नंबर 18
स्टाल नंबर 14 

मूल्य मात्र ------ १२० रूपये

और मैं तो सभी दोस्तों से मिलने को आपकी सेवा में हाजिर रहूँगी ही 
 — 

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

" चलो कुछ बात करें " -------मेरी नज़र से



मृदुला प्रधान का कविता संग्रह " चलो कुछ बात करें " एक प्रकृति प्रेमी का संग्रह सा लगा जहाँ कवयित्री अपनी हर बात को प्रकृति को माध्यम बनाकर कहने की कोशिश करती है और प्रकृति से कविता का संयोग इस तरह बैठाती है कि प्रकृति के रस मन के बीहड़ों को भी उपवन बना देते हैं क्योंकि प्रकृति जब अपना सौदर्य बिखेरती है तो पतझड़ भी बसंत सा खिलखिला जाता है तभी तो कवयित्री सबसे पहले " माँ सरस्वती " की वंदना से आह्वान करती है अपने लेखन का और फिर कहीं " दूब पर " .... हो या  " बसंत मालती " हो या " सूर्योदय " हो या " सूर्यास्त " या फिर हो " बरसात की रात " या फिर हो " नीम का एक पेड़ " , " पेड़ों के पीछे अलसाया " होली का त्यौहार " , " ओस " , " नारियल के पेड़ों " या " गुलमोहर की " या सूरज का घर " या " शीत का प्रथम स्वर " या " महानगर की धुप " जाने कितनी ही कवितायेँ और हैं जहाँ प्रकृति के रंगों की छटा के साथ दिल के रंग भी उकेरे हैं और दोनों का ऐसा तादात्म्य हो जाता है कि पता ही  नहीं चलता फर्क प्रेम और प्रकृति में। कभी पहले कवि प्रकृति के माध्यम से मन के भावों को उकेरा करते थे मगर अब बहुत वक्त से ये माध्यम लुप्तप्राय: सा हो गया था ऐसे में  बहुत दिनों बाद कुछ प्रकृति से सामंजस्य बैठाते हुए जीवन के विविध रंगों को किसी ने उकेरा है  और वो भी महिला कवयित्री ने जो अपने आप में कुछ अलग सा अहसास संजोता है। ना केवल कवयित्री के प्रकृति प्रेम को दर्शाता है बल्कि प्रकृति को देखने और समझने के नज़रिये को भी प्रस्तुत करता है कि कितना कवयित्री का जुड़ाव प्रकृति के हर अंग से है फिर मौसम हो या ज़िन्दगी सबका अपना एक परिवेश है , संरचना है जिनका सीधा सा सम्बन्ध मानव जीवन से है।  

कुछ प्रकृति से तादात्मय करती रचनाओं की एक झलक देखिये :

" कि ऋतु बसंत है " 

" सूरज की पहली किरण में / नहाकर / तुम / और / गूंथकर चांदनी को।/ अपने बालों में / मैं / चलो स्वागत करें / ऋतु बसंत का "

" सुन हवा का " 

"सुन हवा का मंद स्वर/कुछ कुछ थिरकने लगा हूँ /बादलों के साथ भी / अक्सर ज़रा / उड्ने लगा हूँ / खग विहग कल्लोल से / कल्लोल/ मै करने लगा हूँ "

" जब कभी " 

जब कभी तुम्हारी आँखों में / सावन के बादल डोलेंगे / मैं भी उस बादल में छुपकर/ उन आँखों में बस जाऊँगी "

इसके अलावा सामाजिक विडंबनाओं की तरफ भी उनका ध्यान उसी तरह से जाता है जैसे प्रकृति से नाता है वैसे ही तभी तो " बगल के मैदान में " कविता में एक ऐसी समस्या की ओर इशारा किया है जिससे हम सभी दो चार होते हैं और उसे भी ज़िन्दगी का हिस्सा मान घिसटते रहते हैं मगर हमारे काम सरकारी विभागों की पेचीदगियों में अटके रहते हैं आश्वासन के खोखले स्तम्भों पर जिसकी बानगी इस तरह देखिये :

" अधिकारी ने अपने भाषण में कुछ मुद्दे उठाये / तरक्की के अनेकों नुस्खे बताये / कहा फॉल्ट रेट घटाइये / विनम्रता से पेश आइये / विन विंडो कांसेप्ट अपनाइये/ और कस्टमर की साडी उलझें / एक ही खिड़की पर सुलझाइये / और दुसरे ही दिन अक्षरशः पालन किया गया / एक खिड़की छोड़ ताला जड़ दिया गया / हर मर्ज़ के लिए लोग / एक ही जगह आने लगे / सुबह से शाम तक / क्यू में बिताने लगे"

" मजूरों की रोटी " मानवीय संवेदनाओं की जीती जागती मिसाल है जहाँ मेहनत की रोटी के स्वाद की बात ही कुछ और होती है को इस तरह दर्शाया है कि आज की हाइटैक होती ज़िन्दगी की सुविधायें भी बेमानी सी लगती हैं एक सजीव चित्रण 

" थाक रोटी की बडी सोंधी नरम लिपटे मसालों में बना आलू गरम / बैठकर एक झुण्ड में / सब खा रहे थे/ और चांपा -कल का पानी / हाथ का दोना बनाकर / पी रहे थे / और इस आधार पर ही आज हमने / गर्म रोटी/ काट आलू फ़ाँक वाले / थी बनाई/ पर ना कोई स्वाद आया "

 " विदेशी भारतियों के नाम " एक ऐसी कविता है जो उन प्रवासी पक्षियों को बुलाने के लिए एक बार फिर से प्रकृति का सहारा लेती है और हर मौसम के माध्यम से संदेसा भेजती हैं मगर ग्रीन कार्ड की विडंबना हर मौसम पर भारी पड़  जाती है जिसका चित्रण बेहद खूबसूरती से किया गया है :

" मैं जाड़ों की शीतलहरी  को समझाई थी / जाकर कहना / कि बैठ धुप में / मूंगफलियों के दानों के संग / गर्म चाय के ग्लासों से / तलहथियों को गरमा जाएँ "

" सर्द सन्नाटा" समय के बोये अकेलेपन के बीजों को बिखेरने की व्यथा है ताकि खुद से मुखातिब हुआ जा सके और रूह की गहराई तक उतरा सर्द सन्नाटा कुछ कम हो सके फिर चाहे उसके लिए कुछ लिखना ही क्यों न पड़े 

" बंद हो जायेगी " कारगिल युद्ध की त्रासदी का चित्रण है जहाँ युद्ध तो सिर्फ एक वक्त विशेष का रूप होता है मगर उसके बाद भी उसके निशाँ उम्र भर उन शहीदों के घरों में सुलगा करते हैं। 

" तुम्हारी आँखों में " , " प्रिय जब मैं "  कविताओं में प्रेम के रंगों को संजोया है तो कहीं बेटियों के प्रेम  में डूबी माँ की व्यथा का चित्रण " एक दिन " कविता के माध्यम से ऐसे किया है मानो खुद उन क्षणों को जीया हो। 

" आज की नारी " के माध्यम से नारी के गौरव और सम्मान को भी मान दिया है तो " टूटी हुयी कड़ाही " के माध्यम से माँ को याद किया है। 

कवयित्री की पकड़ केवल प्रकृति पर ही नहीं बल्कि हास्य व्यंग्य पर भी है तभी " समय यहाँ " और " सुबह सवेरे " कविता के माध्यम से आज के लाइफ स्टाइल और स्त्री के उस स्वरुप के भी दीदार कराये हैं जिनके कारण बाकि स्त्रियों को भी उसी दृष्टि से देखा जाता है कैसे फैशन और अपनी जरूरतों में जीती स्त्री कब सिर्फ अपने ही सुख के बारे में सोचने लगती है उसका बहुत ही शानदार शैली में विवेचन किया है जहाँ विशुद्ध हास्य तो है ही मगर सोचने के लिए भी एक स्पेस है। 

कवयित्री के लेखन का एक वृहद् आकाश है जहाँ ज़िन्दगी का कोई भी पहलू नहीं जो अछूता रहा हो।छोटी छोटी कवितायेँ जीवन के विभिन्न दृष्टिकोणों से अवगत तो कराती ही हैं साथ ही कवयित्री के भाव मानस की पुष्टि का भी संकेत देती हैं कि हर तरफ कवयित्री की नज़र है जिसे वो इस तरह उद्धृत करती है मानो भोगा हुआ यथार्थ हो जो हर ह्रदय को छू लेता है।  कवयित्री इसी तरह अपनी सोच के पंखों को उड़ान देते हुए आगे बढ़ती रहें और हमें भी अपने अनुभवों से अवगत कराती रहे ऐसी कामना करते हुए कवयित्री को बधाई और शुभकामनाएं देते हुए उनके उज्जवल भविष्य की कामना करती हूँ।  

देवलोक प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह को प्राप्त करने के लिए आप कवयित्री से इस नंबर पर संपर्क कर सकते हैं : 

 M : 9810908099
दूरभाष : 26963355

डी ---१९१ , ग्राउंड फ्लोर 
साकेत , नयी दिल्ली --११००१७ 


गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

बसंत बसंत बसंत ....... ओ बसंत !

आहा ! 
बसंत बसंत बसंत ....... ओ बसंत !

रोम रोम में छाये 
तुम्हारे नव पल्लव 
आम्र मंजरी जो बौरायी 
जब आयी उस पर तरुणाई
धरा की प्यास जो बुझाई 
पीली सरसों भी इठलाई 
ये कैसे खुमारी छायी 
खिल उठी मन अंगनाई 

आहा ! 
बसंत बसंत बसंत ....... ओ बसंत !

जीवन में खिल उठे 
अब कुसुमित पल 
पुष्प पुष्प पर कैसे 
गुन गुन करते भ्रमर 
प्यास के पंछियों की 
कैसी प्यास बुझाई 
हर मुख पर मानो 
सरसों ही खिल आयी 

आहा ! 
बसंत बसंत बसंत ....... ओ बसंत !

मालती चंपा चमेली 
संग संग खिलें सहेली 
हरसिंगार ने मानो 
धरा पर बिछौना बनाया 
मानो करे आह्वान प्रेमी युगल का 
अभिसार रुत है आयी 
मानो किसी इठलाई मचलायी तरुणी की 
आँख गयी है  शर्मायी 
मानो सोमरस के पान को 
व्याकुल धरा है अकुलाई 

आहा ! 
बसंत बसंत बसंत ....... ओ बसंत !
तुम्हारा आगमन भला कैसे हो निर्रथक …… 

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

" एक थी माया " ...........मेरी नज़र से



विजय कुमार सपत्ति के कहानी संग्रह " एक थी माया " को उन्होंने सस्नेह मुझे भेजा तो ह्रदय गदगद हो गया।   संग्रह में कुल दस कहानियाँ हैं जिसमे ज़िन्दगी के रंगों का समावेश किया गया है फिर चाहे वो प्रेम हो , शक हो , मौत हो , भय हो , व्यंग्य हो , देशभक्ति हो या अध्यात्म सबको समेटने का लेखक का प्रयास सराहनीय है। पहला कहानी संग्रह के लिहाज से काफ़ी विचारपरक कहानियों को समेटा है लेखक ने जो जीवन के विभिन्न आयामों से परिचित कराता हुआ मानो एक यात्रा पर ले चलता हो । 

एक थी माया ,मुसाफिर , आभार ऐशो, आठवीं सीढ़ी ये चारों कहानियां प्रेम के विविध रंग समेटे हैं जिसमे एक थी माया के माध्यम से लेखक ने देहजनित प्रेम से परे आत्मिक प्रेम को तो दर्शाया ही है साथ ही प्रेम के विशुद्ध स्तर को भी प्रस्तुत किया है कि जरूरी नहीं होता प्रेम में मिलन , एक नया दृष्टिकोण देता लेखक प्रेम को ज़िंदा रखने की कवायद करता दीखता है साथ ही ज़िन्दगी की जिम्मेदारियों से मुँह ना मोड़ते हुए प्रेम को ज़िंदा रखना ही तो वास्तविक प्रेम है क्योंकि प्रेम में शारीरिक मिलन मायने नहीं रखता।  प्रेम शरीर से परे का वो आभास है जिसमे पूरी ज़िन्दगी भी गुजर जाये मगर क्षणिक मालूम दे और ऐसे ही प्रेम को माया के माध्यम से दर्शाया है लेखक ने जिसमे कहीं कोई प्रतीक्षा नहीं , कोई आदि नहीं , कोई अंत नहीं मगर प्रेम फिर भी है और रहेगा क्योंकि शाश्वत है।  जिसकी बानगी इन पंक्तियों में दृष्टिगोचर होती है :

"तुम मेरे साथ कभी खुश नही रह सकते थे । थोडी देर खुशी रहती और फिर ज़िन्दगी भर का चिडचिडापन । तुम्हारे लिये प्रेम सिर्फ़ बोझ बनकर रह जाता और हर बीतते वक्त के साथ तुम खत्म होते जाते और मै चाहती हूँ कि तुम ज़िन्दा रहो , न सिर्फ़ शरीर में बल्कि ज़िन्दगी के विचारों में भी "

" मुसाफिर " तो जैसे प्रेम की पराकाष्ठा ही है जहाँ इक उम्र बीती , युग बदला मगर प्रेम का दरिया अनवरत बहता ही रहा फिर क्या फर्क पड़ता है उम्र का कोई सिरा मिला या नहीं , न उम्र की सीमा हो न जन्म का हो बंधन , जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन बस जैसे इन्ही पंक्तियों को चरितार्थ किया है लेखक ने जहाँ संतो और करतारे  के प्रेम की इंतेहा थी , जहाँ दो दिल कभी एक दूजे से जुदा थे ही नहीं एक की सांस पर ही दूसरे के जीवन की आस थी और जैसे ही दीया बुझा आस भी इक दूजे में ही समाहित हो गयी , शायद प्रेम के मुसाफिरों की यही मंज़िल हुआ करती है जो जीते जी नहीं मिलते मरने पर ही उनकी चिताओं पर मेले लगा करते हैं। 

"आठवीं सीढ़ी " सपना के जीवन का चमत्कारिक रोमांच है जहाँ प्रेम तो है मगर प्रेम के भी कई रूप हैं , जहाँ भटकन भी है , सम्मोहन भी है , और अतीत और वर्त्तमान में उलझी मनोदशा का भी चित्रण है कैसे किसी एक शख्स में अपने प्रेमी को पाना शादीशुदा होते हुए भी , एक ऐसी स्त्री की मनोदशा का चित्रण है जो अपने खोये प्रेम को एक जैसी शख्सियत होने के कारण उसमे पाना चाहती है और घर टूटने की हद तक जुड़ने को आतुर हो जाती है मगर शुभांकर द्वारा सही समय पर उसे सम्भालना और जीवन को दिशा देना कहानी को रोचक अंत पर ख़त्म करता है जो सन्देश देती है कि खुशियां चाहो तो तुम्हारे आस पास ही होती हैं बस देर होती है तो तुम्हारी सोच को बदलने और समझने की और यहाँ भी प्रेम सिर्फ देह तक सीमित नहीं रहा यही प्रेम की उच्चता है जिसका निर्वाह लेखक ने कहानी में सही तरीके से किया है।  

" आभार ऐशो " अनिमा के जीवन में आये पुरुषों के विभिन्न रूपो को तो चरितार्थ करती ही है साथ में अनिमा का अपनी शर्तों पर जीने के स्वाभिमान को भी उजागर करती है।  

" चमनलाल की मौत " अकेलेपन की त्रासदी झेल रहे उन सभी वृद्धों के जीवन का लेखा जोखा है जिससे मुख नहीं मोड़ा जा सकता , देखते , जानते हुए भी असंवेदनशील होती आज की पीढ़ी द्वारा उनसे किनारा करना एक ऐसा कड़वा सच है जो होना तो सभी के साथ घटित है मगर हम सोचते कहाँ हैं इस बारे में और छोड़ देते हैं वक्त के जंगल में उन्हें अकेला , निसहाय और जब नहीं झेल पाते वो इस अकेलेपन की घुटन को तो एक दिन खुद ही कर लेते हैं जीवन का अंत क्योंकि अकेलेपन से बड़ी सजा कोई नहीं होती। 

" हम बूढों को पैसों से ज्यादा प्यार चाहिए । अपनों का अपनापन चाहिये । हमें ज़िन्दगी नहीं मारती , बल्कि एकांत ही मार देता है ।"


"अटेंशन " आज के समाज का चेहरा उजागर करती व्यंग्यात्मक कहानी है जहाँ एक इंसान सिर्फ समाज में खुद को साबित करने के लिए कैसे कैसे हथकंडे अपनाता है और एक दिन खुद को साबित करके कैसे ठाठ से जीता है उसका प्रमाण है।  सिर्फ एक अटेंशन पाने की खातिर अच्छे  बुरे का सोचे बगैर ऐसी दलदल में जा गिरता है जहाँ से निकलना आसान नहीं होता और नेतागिरी किसी दलदल से कम कब हुयी है , कुर्सी का चस्का भला किसने छोड़ा है , ऐसे ही ख्याल का चित्रण है इस कहानी में।  

" द  परफेक्ट मर्डर " दांपत्य सम्बन्धो में उमड़े शक के कीड़े का वो दंश है जिससे न काटने वाला बचता है और न ही कटने वाला और जब अंत में शक के ताबूत से पर्दा उठता है तो सिवाय पछतावे के कुछ हाथ में नहीं बचता जिसे प्रस्तुत करने में लेखक पूरी तरह सक्षम रहा।  

" टिटलागढ़ की एक रात " भय और रोमांच की दुनिया की सैर कराती है जिसे बखूबी , पूरी शिद्दत से लेखक ने पेश किया है।  

" आसक्ति से विरक्ति की ओर " बुद्ध के उपदेशों का चित्रण है जहाँ विचित्रसेन के माध्यम से ये बताया गया है कि जिसने मन को जीत लिया उसने सारी इंद्रियों पर तो नियंत्रण कर ही लिया बल्कि साथ में उसके आचरण में ऐसी दिव्य शक्ति आ जाती है कि जो उसके संसर्ग में आता है फिर चाहे वो नगरवधू के रूप में देवयानी ही क्यों न हो , उसके भी जीवन को परिवर्तित किया जा सकता है , देखा जाए तो ये जैसे किसी प्रमेय को सिद्ध करना होता है उसी तरह का प्रयोग है जिसे बुद्ध ने विचित्रवीर्य के जरिये दिखाया उस समय के धर्मभीरुओं को , ढकोसलों पर विश्वास करने वालों को और एक जाग्रति का आह्वान किया।  

" मैन इन यूनिफार्म " देश के सैनिक के बलिदान का एक ऐसा कथानक है जो सोचने को तो विवश करता ही है साथ में लेखक द्वारा उठाया  प्रश्न दिलों को कचोटता है आखिर एक शहीद के बलिदान की कीमत क्या है ?

" दूसरी सुबह कोई बहुत ज्यादा बदलाव नज़र नहीं आया मुझे अपने देश में , जिसके लिये मैने जान दे दी ………"

ये लेखक का पहला कहानी संग्रह है इस दृष्टिकोण से बेहद सार्थक और सफल है जो पाठक को वो सब देता है जिसकी तलाश में एक पाठक निकलता है और पढ़कर जब संतुष्ट हो जाता है तो वहीँ लेखक का लेखन सफ़र हो जाता है।  

हिंदी साहित्य निकेतन , बिजनौर से प्रकाशित कहानी संग्रह " एक थी माया " उम्मीद है अपनी एक पहचान बनाएगा और अपना एक पाठक वर्ग भी इसी के साथ लेखक को उज्जवल भविष्य की शुभकामनाएं देती हूँ कि वो इसी तरह लेखन करते रहे और आगे बढ़ते रहे।  

२५ ० रूपये में उपलब्ध ये किताब प्राप्त करने के लिए आप यहाँ संपर्क कर सकते हैं : 

विजय सपत्ति 
M : 09849746500

EMAIL : vksappatti@gmail.com 

शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

अब बूझने को बचा क्या ?

साँस पर गाँठ 
मौत की अंतिम अरदास 
अब बूझने को बचा क्या ?

चल बंजारे 
डेरा उठाने का वक्त आ गया 
क्योंकि 
अंतत: बंजारे ही तो हैं हम सब

ज़िन्दगी से बहुत कर चुके यारा
अब
मौत से इश्क करने का जो वक्त आ गया

रूह के लिबास को दुरुस्त करने का वक्त आ गया ……

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

मेरे मन का राग हो तुम



हे तमहारिणी ! 
प्रकाश का भंडार हो तुम
सदबुद्धि का आधार हो तुम 
लेखनी का प्रमाण हो तुम 
वाणी में सुरों का सार हो तुम 
मानव के रोम- रोम में बसा 
प्रेम का संचार हो तुम 


हे वरदायिनी !
वरदहस्त बनाये रखना 
अपनी कृपा बरसाये रखना 
जीवन में ज्ञान का उजास जगाये रखना 
पथरीले पथ भी सुगम बनाये रखना 
बस अपने शिशुओं पर इतना स्नेह बनाये रखना 

हे वीणावादिनी !
नवयुग का आगाज़ हो तुम 
ज्ञानोदय का भंडार हो तुम 
जीवन का आधार हो तुम 
प्रकृति के कण- कण में बजता 
सदियों से बहता अजस्र नाद हो तुम 


हे वागीश्वरी !
मेरी वाणी को आधार देता 
कृपामय प्रसाद हो तुम 
हे कादम्बरी !
मेरे जीवन की नयी सुबह का 
एक गुनगुनाता भाव हो तुम 
हे वरप्रदायिनी !
कोटि कोटि नमन करता 
मेरे मन का राग हो तुम