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शनिवार, 31 जनवरी 2015

आइये चुनाव चुनाव खेलें

आज के हमारा मेट्रो में प्रकाशित आलेख



आइये चुनाव चुनाव खेलें . चुनाव का मौसम है . अच्छा किसे चुनना है ?
कोई शर्ट है या जीन्स ? सब्जी हैं या फल ? या कोई सिने स्टार  है ? बोलो किसका चुनाव करना है ?या फिर उन्हें जो सब्जबागों की खेती करते हैं और जब फसल पक कर तैयार हो जाती है तो खुद ही सारी काट कर ले जाते हैं और किसान शक्ल ही देखता रह जाता है या फिर उन्हें जो सत्य का झंडा लेकर चलते हैं मगर अकेले खड़े दिखते हैं , जिनके सच को भी झूठ साबित करने के लिए सारे जहाँ के जोड़ तोड़ किए जाते हैं , जिनको सत्ता से दूर रखने के लिए हर मुमकिन कोशिश की जाती है ताकि अपनी सत्ता पर आंच न आये और वो अपनी रोटियां सेंकते रहे . अमां यार तुम भी अजीब खडूस हो , किन चक्करों में पड़ गए ........... हम कौन सा तुम्हें असल में चुनने को कह रहे हैं अगर ऐसा सच बोलोगे बाबू सच कहते हैं धर लिए जाओगे किसी न किसी दफा में फिर करना चुनाव का विश्लेषण . यहाँ सच किसे स्वीकार्य होता है , सब चाशनी में डूबे झूठ से ही खुश हुआ करते हैं . 

तो मियां फिर किस चुनाव की बात कर रहे हो हम तो यही समझे कि तुम चुनाव की बात कर रहे हो . तुम भी अजीब अहमक हो , चुनाव तो किसी का भी किया जा सकता है अब देखो बीवी भी तो चुनाव के बाद ही लाते हो घर में जब सबकी वोट उसके पक्ष में पड़ जाती हैं , बाज़ार से तुम कुछ खरीदने जाते हो तो भी चार चीजों में से बेहतर का चुनाव करते हो न तो बस इसी तरह हमने भी सोचा इस बार चुनाव करवा ही डालें .
अरे मियां कौन से चुनाव ?
 बस वो ही चुनाव जिसमे आँख होते हुए अंधे होते हैं हम , जुबां होते हुए गूंगे और कान होते हुए बहरे . 
मतलब ?
बस सिर्फ इतना गाँधी जी के बताये आदर्शों पर चलो 
क्या मतलब 
सीधा तो कह रहा हूँ ..........क्या होगा तुम्हारे चुनाव करने से ? कुछ भी तो नहीं ? मान लो तुमने किसी पर विश्वास कर उसे चुन लिया और वो जीत भी गया तो क्या होगा ? क्या उसे तब काम करने दिया जाएगा ? क्या उसकी राह में रोड़े नहीं अटकाए जायेंगे ? और यदि गलती से वो भी तुम्हारे भले के लिए वो पीछे मुड़ गया तो क्या तुम्हारे पास दिमाग है इतना की सोच और समझ सको कि उसने ऐसा कदम क्यों उठाया . तुम सिर्फ एक भीड़ हो , भीड़ के सिवा कुछ नहीं और भीड़ का कोई धर्म नहीं होता उसका सिर्फ एक ही नारा होता है ........जहाँ सब चलें , जहाँ की हवा चले उधर मुड़ जाओ क्योंकि तुम खुद कुछ नहीं सोच सकते , तुम्हारी सोच पर मीठी मीठी बातों के ताले लगे हैं , तुम एक कुंठित सोच के मालिक हो ........अभी तुम , तुम्हारी सोच नहीं हुई है आज़ाद इसलिए कहता हूँ छोड़ो मियां चुनाव के चक्कर , जहाँ हवा का रुख देखो बह जाना इससे ज्यादा कुछ तुम्हारी हैसियत नहीं और न है तुम्हारी सोच की ऊंगली में वो दम जो दिखा सके अपना दम . 

हवाओं का रुख बदलने के लिए सोच का बदलना जरूरी है और अभी तुम्हें चुनाव का अर्थ तो पता नहीं तो सही और गलत तो तब समझोगे न . जाओ , तुम सिर्फ आटे , दाल, सब्जी आदि ही चुनो क्योंकि जीवन की महती आवश्यकता हैं ये सब बाकी उन चुनावों की राजनीति तुम नहीं समझ सकते इसलिए खेलो सिर्फ चुनाव चुनाव अपने घर तक ही ..........देश और समाज को छोड़ दो उसके हाल पर क्योंकि वो जानते हैं तुमसे किसका , कब और कैसे चुनाव करवाना है ........जय हिन्द !!!

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

इक लड़की गली के मोडपर

कुंवारी हसरतों के अन्जाने लिहाफ ओढ़कर 
वो देखो बैठी है इक लड़की गली के मोडपर


इश्क प्यार मोहब्बत लफ़्ज़ों से 
खेलेगी खिलखिलाएगी मुस्कुराएगी 
फिर काँच सी जब बिखर जायेगी 
हर टूटे हिस्से में अपना ही अक्स पाएगी 
बस यूं उसकी हर हसरत कुंवारी ही रह जायेगी 

कहीं टूटेंगे कुछ शाख से गुंचे 
कहीं बिखरेंगे आरजुओं के कंचे 
वो समेट समेट सहेजेगी आँचल में 
वो फिसल फिसल जायेंगे रेत की मानिंद 
इक रात की तफसील नहीं है ये 
उम्र के जोड़ों पर खुदे मिलेंगे किस्से 


बरसातों में भीगे बिना भी 
रूह में भीगे मिलेंगे हिस्से 
ऋतु के बदलने से नहीं बदलते मौसम 
यूं उसे रोज तकलीफ दिया करेंगे किस्से 
एक दिन की खता नहीं थी जो 
उम्र के उस पायदान पर रुके मिलेंगे 
अधूरे प्यार की अधूरी दास्ताँ बन 
उम्र से इश्क किया करेंगे वो हिस्से 

कुंवारी हसरतों के अन्जाने लिहाफ ओढ़कर 
वो देखो बैठी है इक लड़की गली के मोडपर

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

चुनावी मौसम की बरसातों में

सुना है एक बार फिर 
चुनाव का मौसम लहलहा रहा है 
निकल पड़े हैं सब दल बल सहित 
अपने अपने हथियारों के साथ 

शब्दबाणों का करके भयंकर वार 
करना चाहते हैं पूरी सेना को धराशायी 
भूलकर इस सत्य को 
चुनाव है भाई 
यहाँ साम दाम दंड भेद की नीतियां अपनाकर ही 
जीती जा सकती है लड़ाई 

जी हाँ 
न केवल तोड़े जायेंगे दूसरे दलों के शीर्ष नेता 
बल्कि जरूरी है आज के समय में 
मीडिया पर भी शिकंजा 

जिसकी जितनी चादर होगी 
उतने पाँव पसारेगा 
मगर जिसका होगा शासन 
वो ही कमान संभालेगा 
करेगा मनमाने जोड़ तोड़ 
विरोधियों को करने को ख़ारिज 
जरूरी है आज 
अपनी जय जयकार स्वयं करनी 
और सबसे करवानी 

बस यही है सुशासन 
यही है अच्छे दिन की चाशनी 
जिसमे जनता को एक बार फिर ठगने का मौका हाथ लगा है 

फिर क्या फर्क पड़ता है 
बात पांच साल की है 
भूल जाती है जनता 
याद रहता है उसे सिर्फ 
अंतिम समय किया काम 

चुनावी मौसम की बरसातों में भीगने को 
कुछ ख़ास मुखौटों की जरूरत होती है 
जो बदले जा सकें हर घात प्रतिघात पर 
जहाँ बदला जा सके ईमान भी बेईमान भी 
और चल जाए खोटा सिक्का भी टंच सोने के भाव 

बस यही है अंतिम मौका 
करो शब्दों से प्रहार 
करो भीतरघात 
येन केन प्रकारेण जरूरी है आज 
बस चुनाव जीतना..........और कुर्सी हथियाना  

"भरोसा शब्द टूटने के लिए ही बना है ........सभी जानते हैं ........हा हा हा "

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

गोलियों का तांडव आखिर कब तक ???


आओ सिर जोडें और रो लें 
आओ दो आंसू बहा लें 
दुःख प्रकट कर दें 
कैंडल मार्च निकाल लें 
हम साथ हैं समूचे विश्व में होते संहार के 
और कर दें इतिश्री अपने कर्तव्यों की 
बस यहीं तक है हमारी संवेदनाएं दुःख और पीडाएं 

क्या सिर्फ यहीं तक सीमित रहेंगे हम ?
क्या यही है अंतिम विकल्प ?
सिर्फ रोना और श्रद्धांजलि प्रकट करना 
आखिर कब तक चलेगा ये सब ......... कभी सोचा है ?
आखिर कब तक हमारी सहिक्ष्णुता का मोल हम यूं चुकायेंगे 
जान दे देकर कौन सा इतिहास अमर बनायेंगे ?

वक्त आ गया है 
केवल जागने का नहीं 
जागे हुए तो हैं हम 
वक्त आ गया है 
एकजुट होने का 
आतंकवाद को शिकार बनाने का .......इस बार शिकार बनने का नहीं 

जानती हूँ 
कहने भर से कुछ नहीं होना 
फिर भी कह रही हूँ 
दिल का गुबार निकाल रही हूँ 
जबकि पता है 
यहाँ भी राजनीति ने सिर जोड़ा है 
सब अपने अपने घर बचाए हैं 
बिखरी तीलियों से नज़र आये हैं 
जानते हुए इस सत्य को 
अंधियारे वक्त में साये भी राजदार नहीं होते 
फिर कौन सी उम्मीद के दीप रौशन होंगे 

सब अपने अपने स्वार्थों से ग्रसित 
खड़े हैं अलग अलग दिशाओं में मुंह करे 
बिना सोचे समझे इस तथ्य को 
आज मेरी तो कल तेरी बारी है 

राजनीति की बिसात पर गोलियों का तांडव आखिर कब तक ???

शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

मेरे इश्क की दुल्हन

मेरे इश्क की दुल्हन 
श्रृंगार विहीन होने पर ही सुन्दर लगा करती है 
फिर नज़र के टीके के लिए 
रात की स्याही कौन लगाये 
बस चाँद का फूल ही काफी है 
उसके केशों में सजने को 

जाने क्यों फिर भी 
एक मुट्ठी स्याह रात 
खिसक ही जाती है हाथों से 
और गिर जाती है 
मेरे इश्क की दुल्हन की चूनर पर 
और जल जाता है सारा आस्माँ 

उदास रातों के कहरों की 
डोलियाँ उठाने को 
जरूरी नहीं चार कहारों का होना ही ……