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मंगलवार, 31 मार्च 2015

एक स्त्री का प्रश्न है ये ...........

एक मुद्दत हुई 
न अपना कोई धर्म बना पायी 
न ही अपनी कोई जाति 
जबकि पायी जाती है ये 
हर धर्म और जाति में 
क्योंकि संभव नहीं इसके बिना 
सृष्टि की संरचना 

जिसने जो धर्म बताया अपना लिया 
जिसने जो जाति बताई अपना ली 
जिसने जो घर बताया उम्र बिता दी 


उसका धर्म क्या है 
उसकी जाति क्या है 
ओ समाज के ठेकेदारों 
आओ उगलो उगलदानों में 
पीक अपने तालिबानी फतवों की 

क्योंकि एक मुद्दत से 
निष्कासित है वो 
घर , धर्म और जाति से 

एक स्त्री का प्रश्न है ये ...........

बुधवार, 25 मार्च 2015

मोहब्बत ऐसे भी होती है जानां .........


आज मैंने रखा है ब्रह्मभोज
ब्राह्मणों के लिए नहीं 
कहाँ आज वैसे ब्राह्मण बचे 
जिनके शाप से शापित हो जाएँ पूरी नस्लें ही 

ये भोज है तुम्हारे लिए 
सिर्फ तुम्हारे लिए ..... आखिरी बार
भोज की सामग्री में है 
इंतज़ार के पीले फूल , गुलाबों की सूखी पत्तियाँ
और मेरी कभी न टूटने वाली आस की महक 

शायद अब टूट जाए हर रस्मी दीवार 
और तुम पुकार लो एक बार 
हो जाए मेरी आखिरी आरजू का तर्पण 
और हो जाए मेरी युगों से प्यासी प्यास का अंत 


आज आखिरी दिन है 
और आखिरी लम्हा 
करो विदा मुझे 

सुनो 
चाहो या न चाहो 
मरने पर तो सभी विदा किया करते हैं 
और मुझे होना है जीते जी विदा 
तुमसे , तुम्हारी याद से , तुम्हारे नाम से 


क्या देखा है कभी मेरी तरह 
मौत का आखिरी जश्न मनाते किसी को

मोहब्बत ऐसे भी होती है जानां .........


सोमवार, 16 मार्च 2015

' आइये स्टिंग करें '

' आइये स्टिंग करें ' शनिवार के 'हमारा मेट्रो' में प्रकाशित आलेख






आइये स्टिंग करें भाई कोई काम धंधा नहीं है आजकल , बेरोजगार हूँ समझ नहीं आता क्या करूँ ? तो है न सबसे आसान काम जिसमे तुम्हारा कुछ नहीं जाता बस क्रेडिट तुम्हें मिल जाता है जीवन मज़े से गुजरने लगता है वो क्या बताइए जरा भाईजान यहाँ तो हालत पतली हो गयी है , जेब खाली है और बीवी ने भी घर में घुसने से मना कर दिया है जब तक जेब भर नहीं जाती तो भैये काहे चिंता करते हो , हम किस मर्ज़ की दवा हैं .हम तो वक्त देखकर चाल बदल लिया करते हैं , अब देखो मौसम स्टिंग का देखो कितना सुहाना है , तो आइये स्टिंग करें , लोग अपनों के ही स्टिंग कर रहे हैं और देखो तो कैसे छा रहे हैं टीवी चैनलों पर , अख़बारों में . सिर्फ जरूरत है एक बार स्टिंग करने की वो भी किसी नेता , अभिनेता की बस , तुम्हें प्यारे छाने से कोई नहीं रोक सकता . देखो टीवी वालों को तो अपनी टी आर पी बढाने को मसाला चाहिए फिर वो झूठा है या सच्चा उन्हें फर्क नहीं पड़ता क्योंकि देखने वाला तो सिर्फ वो ही चैनल देखता है जहाँ ऐसी मसालेदार खबर आती है . हर किसी को अपने से ज्यादा दुसरे की ज़िन्दगी में झाँकने की आदत होती है तो ये स्टिंग ऐसे मनोरोगियों के लिए दवा का काम करते हैं , घर बैठे उनका इलाज हो जाता है तो इसमें किसी के बाप का क्या जाता है फिर साथ में मनोरंजन का मनोरंजन . और सबसे बड़ी बात यदि इसमें कोई अपने आस पास का जानकार फंस जाता है तो फिर तो पूछो ही मत बन्दे की बल्ले बल्ले हो जाती है , हर तरफ खुद की इमानदारी के ढोल पीटते हुए उसकी बेईमानी के ऐसे परखच्चे उड़ाता है कि बेचारा स्वप्न में भी सिर्फ तुम्हें ही देखता है , देखो कहता था न साला रिश्वत लेता है , बिना रिश्वत लिए तो अपने बाप की तरफ भी नहीं थूकता तो और लोग तो क्या चीज हैं , कल तक सबको गाजर मूली की तरह काटता था न अब काटेगा साला जेल में गाजर मूली तब भाव समझ आएगा . देखो बाबू इसके लिए कोई ज्यादा मेहनत नहीं करनी सिर्फ एक ऐसी तकनीक से लैस चीज ले लो जिसके बिना तुम्हारा गुजारा भी न हो और कोई तुम्हें उसे बाहर ही छोड़कर आने को न कहे बस फिर देखो जिसे जब चाहे स्टिंग कर सकते हो और अपने काम निकलवा सकते हो फिर वो घर का हो बाहर का , पडोसी हो या रिश्तेदार .......यूं समझो प्यारे ये तो अंधे के हाथों बटेर लग गई .........तुम चाहो तो इससे सत्ता पलट सकते हो फिर तुम्हारे जीवन की छोटी मोटी समस्याएं तो हैं क्या चीज बस इतना ध्यान रखना अपने बच्चों को मत सिखाना वर्ना कहीं ऐसा न हो तुम कामवाली बाई को देख रहे हों या पड़ोसन से नैन मटक्का कर रहे हों या सेक्रेटरी के साथ डेट पर हों और तुम ही हो जाओ स्टिंग के शिकार ........फिर मत कहना स्टिंग है बेकार , ये तो झूठी स्टिंग है , ये तो फेक है , इसमें मैं नहीं मेरे जैसा दिखने वाला कोई और है क्योंकि प्यारे जिसे एक बार स्टिंग का चस्का लग जाता है तो बहुत सी बार शिकारी भी शिकार हो जाता है इसलिए अपने बचाव के सारे उपाय करने के बाद स्टिंग के क्षेत्र में कदम रखना वर्ना अभिमन्यु का चक्रव्यूह में फंसकर मरना निश्चित है इस सबक को हमेशा याद रखना और जय हो स्टिंग देवता कह स्टिंग के क्षेत्र में कदम रखना . अब जाओ प्यारे ....सामने से हमारी महबूबा तशरीफ ला रही हैं तुम्हें देख बेवजह हिचक जायेंगी और आगे निकल जायेंगी और हमारा तो दिन ही पनौती की भेंट चढ़ जाएगा वैसे ही सुबह सुबह पनौती की शक्ल ही तो देखकर आया हूँ शायद अब थोडा सुकून मिले आहा क्या जोरदार उपाय बताया है .......जय हो स्टिंग देवता बचकर रहना मियां क्योंकि सोचता हूँ तुम से ही कारोबार शुरू करता हूँ क्योंकि जेब खाली है और शाम को बीवी के लिए डोमिनोज से पिज़्ज़ा खिलाने की फरमाइश भी पूरी करनी है .........क्या ख्याल है ?

गुरुवार, 12 मार्च 2015

ख़ामोशी चुप्पी मौन

ख़ामोशी चुप्पी मौन 
इनका तुमने एक ही अर्थ लगाया 
मगर कभी नहीं आँक पाए वास्तविक अर्थ 
खामोशियों के पीछे जाने कितने तूफ़ान छुपे होते हैं 
चुप्पी के पीछे जाने कितने चक्रवात चला करते हैं 
मौन की आँधियों में भी शोर हुआ करते हैं 

सावधान रहना , मत छेड़ना कभी 
किसी के मौन को 
किसी की ख़ामोशी को 
किसी को चुप्पी को 

क्योंकि 
फिर कुछ नहीं बचेगा बचाने को 

महज वहम है तुम्हारा ख़ामोशी चुप्पी और मौन पर्याय हैं विकल्पहीनता के 

रविवार, 8 मार्च 2015

फिर नहीं रहोगी तुम मोहताज एक दिन के ताज की ..........

कितना अच्छा लगता है न 
जब एक दिन में ज़िन्दगी सिमट जाती है 
तुम्हें मुक्ति की लोलीपॉप हाथ में पकड़ाई जाती है 
और तुम एक बार फिर 
अदृश्य चक्रव्यूह की शिकार हो 
रख देती हो खुद को गिरवीं 

आह ! स्त्री मुक्ति , स्त्री विमर्श , महिला दिवस 
सिर्फ एक दिन मुक़र्रर किया गया है तुम्हें साँस लेने को 
क्या संतुष्ट हो एक दिन से ओ स्त्री ?

शायद तभी तो खुश हो दे देती हो 
'महिला दिवस की शुभकामनाएं '
बिना जाने महिला दिवस के अर्थहीन औचित्य को 
क्योंकि 
तुम हो तो जीवन है 
जीवन का अर्थ है 
ये संसार है 
इसका आधार है 
बस इतना सा ही तो समझना है तुम्हें 
फिर हर दिन तुम्हारा है 
फिर नहीं रहोगी तुम मोहताज एक दिन के ताज की ..........

शनिवार, 7 मार्च 2015

जो दिल्ली न कर पायी दीमापुर ने कर दिखाया


जो दिल्ली न कर पायी दीमापुर ने कर दिखाया ........बता दिया देर से मिला न्याय भी अन्याय ही होता है जिसका उदाहरण रहा बीबीसी द्वारा दिखाया विडियो तो जब जनता देखेगी कि यहाँ कोई सुनवाई नहीं है , न्याय की आस में आस भी टूट जाती है मगर न्याय नहीं मिलता तो जनता को ही पहल करनी पड़ती है . बेशक फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट का नाटक किया जाए मगर न्याय तो अब तक नहीं मिला और जनता के सब्र का बाँध टूट गया जिसने बता दिया यदि सरकार आँख मूंदेंगी और न्याय के नाम पर जनता की भावनाओं से खिलवाड़ होगा तो जनता खुद न्याय कर देगी . सिर्फ कैंडल मार्च निकाल देने भर तक नहीं है कर्तव्य शायद जनता अब जान चुकी है .

इस वाकये से ये तो सिद्ध हो गया कि अब जनता के सब्र का बाँध टूटने लगा है और सरकार को चेत जाना चाहिए और क़ानून में भी बदलाव करना चाहिए नहीं तो ऐसी घटनाएं हर गली चौराहों पर होती दिखेंगी क्योंकि जिस तरह से रेप की घटनाएं बढ़ी हैं उस अनुपात में कोई सख्त कार्यवाही अब तक नहीं की गयी जिससे उनमे कोई डर हो न ही जाग्रति के लिए कोई प्रयास किया गया . कहीं कल ऐसा न हो कि जनता अपनी अदालत में खुद ही न्याय की कुर्सी पर बैठ इस तरह न्याय करने लगे . ऐसा वक्त आने से पहले जरूरी है सोई हुई सरकार जागे और उचित व निर्णायक कदम उठाये ताकि एक स्वस्थ सन्देश तो जनता में जाए ही साथ में उन रेपिस्टों को भी डर हो कि यदि ऐसा कुछ किया तो उनका क्या हश्र होगा . 

अब तो ये हाल देख वैसे मन तो यही होता है कि क़ानून ही ये बन जाए जो ये दुष्कर्म करेगा उसे जनता के हवाले कर दिया जाएगा जो उसकी बोटी बोटी जब नोचेगी तब शायद एक पीडिता के दर्द का अहसास होगा और शायद वो ही न्याय होगा कुछ हद तक ...........

सोमवार, 2 मार्च 2015

नहीं होना हमें अमर अविजित .............

क्या फर्क पड़ता है नाम से
अक्सर कहा गया
और हमने मान लिया

नाम कोई हो
पहचान करा देता है
तुम्हारे धर्म की
और हो जाते हो तुम निष्कासित

अभिव्यक्ति की आज़ादी
महज स्लोगन भर है
नहीं जान पाए तुम
और गँवा बैठे जान

आसान है खोल में दुबके रहना
मुश्किल है हलक में ऊंगली डाल सच को कहना
क्या नाम अविजित होने से संभव था तुम्हारा अविजित रहना
शायद इसी सच से तुम अनजान रहे

सुनो
तुमसे जाने कितने आये और चले गए
धर्म की चिता पर जिंदा जलना नियति है
जानते हो क्यों ?
एक नपुंसक समाज में जन्मे थे
जहाँ इंसानियत से ऊपर मजहब हुआ करता है

कह तो सकते हैं
तुम्हारी आहुति निरर्थक नहीं जाएगी
विचार के रूप में जिंदा रहोगे हमेशा
आसान है इस तरह कहकर पल्ला छुड़ाना
या खुद को खैर ख्वाह सिद्ध करना
मगर
मुश्किल है तुम्हारी जलाई मशाल को पकड़ क्रांति का बीज बोना

अभी एक डरे सहमे समाज का हिस्सा हूँ मैं
कठमुल्लाओं की देहरी पर सजदा करने तक ही है अभी मेरी पहुँच
आम इंसान हूँ न
और एक आम इंसान की पहुँच सिर्फ देहरियों तक ही हुआ करती है

उम्मीद का कोई धागा मत बांधना हमसे
हम कागज के बने वो पुतले हैं
जो पहली बारिश में ही गल जाते हैं

सबकी अपनी अपनी लडाइयां हैं
तुम अपनी लड़ाई लड़ चुके
और हम चाहते हैं बिना लडे ही अविजित रहना

अभिव्यक्ति की आज़ादी का अंतिम छोर है मौत
और अभी जीना है हमें अपनी नपुंसकता के साथ

जाओ तुम अमर रहो और हमें हमारे हरम में दफ़न रहने दो
नहीं होना हमें अमर अविजित .............