अनुमति जरूरी है

मेरी अनुमति के बिना मेरे ब्लोग से कोई भी पोस्ट कहीं ना लगाई जाये और ना ही मेरे नाम और चित्र का प्रयोग किया जाये

my free copyright

MyFreeCopyright.com Registered & Protected

शनिवार, 26 दिसंबर 2015

कांच के शामियाने - मेरी नज़र में


 
चाहती तो यही थी कि कहीं पहले छप जाए उसके बाद ही यहाँ लगाऊँ लेकिन आज का दिन रश्मि की ज़िन्दगी का ख़ास दिन है और हम तो पुराने मित्र हैं ब्लोगिंग के वक्त के तो लगा इससे बेहतर और क्या तोहफा दे सकती हूँ अपनी मित्र को , रश्मि जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाओं के साथ यही दुआ तुम्हारा लेखन अनवरत जारी रहे . ये लीजिये रश्मि के पहले उपन्यास पर मेरी प्रतिक्रिया :


जो उपन्यास चार पांच साल पहले किश्तों में पढ़ा हो और छपकर आने के बाद एक दिन में अपने आपको पढवा ले तो कोई तो बात होगी न उसमे . न केवल कहानी बल्कि लेखन कौशल भी अपने चरम पर ही होगा तभी आप इतनी शिद्दत से उसे दोबारा पढ़ सकते हैं क्योंकि एक बार पढ़ी चीज दोबारा इतनी जल्दी नहीं पढ़ी जाती खासतौर से कहानी या उपन्यास जब तक आप भूल न गए हों . और ऐसा ही हुआ ‘ कांच के शामियाने ‘ उपन्यास के साथ जो हिन्द युग्म से प्रकाशित लेखिका रश्मि रविजा का पहला उपन्यास है .


ऐसा कम ही हुआ कि कुछ पढ़ा हो और उसके बारे में लिखने की इतनी उत्कंठा हो कि दिल चाहे पूरा पढने से पहले ही आप लिखने बैठ जाओ . हर पात्र पाठक के दिलो – दिमाग को इतना बेचैन किये रहते हैं कि पाठक मन चैन नहीं पाता बिना कुछ कहे . पात्रों की बुनावट , चरित्र जैसे हर किरदार अपनी जगह पर कायम जिसे न जबरदस्ती ठूँसा गया और न ही निकाल सकते . लेखिका का पहला उपन्यास होते हुए भी एक मंजे हुए कथाकार की तरह कसी बुनावट , प्रवाहमय शैली और भावनाओं के आवेग का ऐसा तारतम्य है कि कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता कि लेखिका एक नवोदित लेखिका है .

आदिकाल से स्त्री के दुःख दर्द लिखे जाते रहे और आज भी लिखे जा रहे हैं , जाने कब ये सिलसिला ख़त्म होगा और वो वक्त आएगा जब स्त्री के सिर्फ कौशल और दृढ व्यक्तित्व पर कहानियां और उपन्यास लिखे जायेंगे क्योंकि स्त्री को दुःख और दर्द का मानो प्रतीक ही बना दिया गया है और उससे इतर उसका कोई व्यक्तित्व ही नहीं लेकिन आज भी स्त्री की दशा में कोई खास फर्क नहीं आया तो एक कथाकार आखिर करे क्या सिवाय उसके दर्द को अपनी कलम द्वारा अभिव्यक्त करने के फिर वो किरदार कहीं से भी लिया हो चाहे समाज से चाहे खुद के निजी जीवन से चाहे सखी सहेली के जीवन से और ये उपन्यास पढ़ते हुए भी ऐसा ही लगा मानो किसी के जीवन का सच्चा चित्रण हो .

उपन्यास पढ़ते हुए पाठक इतना डूब जाता है कि उसे घटनाएँ और पात्र चलचित्र पर चलती फिल्म के दृश्य से लगते हैं . पाठक के दिल दिमाग में एक औरा सा बन जाता है और वो उसी के परिदृश्य में पूरी कहानी को आँखों के आगे घटित होते हुए देखने लगता है जो किसी भी कुशल कथाकार की लेखनी की सबसे बड़ी सफलता है और इसके लिए लेखिका बधाई की पात्र है .

अब बात करते हैं कहानी की तो जया जो मुख्य पात्र है कहानी की मानो समूचा स्त्री विमर्श उसी में समाया है . त्याग और सहनशीलता की प्रतिमूर्ति के साथ हौसला और दृढ इच्छाशक्ति की भी धनी है .

बिहार के परिदृश्य में कहानी आकार लेती है तो देशज भाषा ने उसमे चार चाँद लगा दिए . एक लड़की जब अपनी यौवन की दहलीज पर होती है तो सपने आकार लेते हैं मगर जिन लड़कियों के सिर पर पिता का साया असमय उठ जाता है वो अपने सपनों को मन की डिबिया में बंद कर देती हैं ऐसा ही किरदार जया का है . एक आम लड़की की तरह सहज जीवन यापन करने वाली और अपनी जिम्मेदारियों को समझने वाली . जीवन में कुछ कर गुजरने का हौसला रखने वाली नहीं जानती थी कि वक्त कब और कैसे करवट बदलता है कि एक पल में जीवन बदल जाता है और उसका भी जीवन राजीव के आने से बदल गया जो कुंठित और जिद्दी सोच का मालिक है और एक बार जो ठान ले उसे करके ही दम लेना उसकी प्राथमिकता में शामिल हो जाता है जो यही सिद्ध करता है कि ज्यादा लाड प्यार किस हद तक बच्चों के जीवन को बर्बाद कर देता है न वो खुद चैन से जी पाते हैं न साथ रहने वालों को जीने देते हैं , अपना जीवन तो बर्बाद करते ही हैं , अपने अपनों का भी बर्बाद कर देते हैं और किसी के भी हाथ कुछ नहीं लगता . राजीव जैसे चरित्र हमारे आस पास ही विचर रहे होते हैं जो अपनी झूठी शान के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं वहीँ अपने बीवी बच्चों को एक एक पैसे के लिए मोहताज रखते हैं वहीँ अपने उच्च ओहदे का गुमाँ उनके इस स्वभाव को पोषित करने में और सहायक सिद्ध होता है . दोगला चेहरा रखे ये लोग बाहरवालों के सामने इतने शरीफ होते हैं कि कोई भी उनसे सहानुभूति रखने लगे और दूसरे को दोषी समझने लगे और ऐसा ही राजीव करता रहा जया के साथ यहाँ तक कि बच्चों के साथ भी , खुद को बेचारा साबित करने का कोई मौका नहीं छोड़ता वहीँ जया को बहुत ख़राब साबित करने से भी नहीं चूकता और सामने वाला भी यही सच समझता . खुद को हीरो और दूसरे को विलेन सिद्ध करना इनके बाएं हाथ का खेल होता है और इसी का फायदा राजीव तमाम उम्र उठाता रहा .
जया को जबरदस्ती पाने की जिद ने न केवल राजीव की बल्कि सभी की ज़िन्दगी बर्बाद कर दी . यदि इसके भीतर झांको तो पता चलेगा कि आखिर ऐसा हुआ क्यों ? जब राजीव के घरवालों का रहन सहन बोलचाल देखो तो पता चलता है ऐसा विषवृक्ष किस बीज की उपज है जहाँ कोई किसी से कम नहीं . उनके लिए पैसा ही प्रमुख है . तीन बहनों और एक भाई में सबसे छोटी जया के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गयी तब भी वो उस दंड की सजा तमाम उम्र पाती रही जो उसने किया ही नहीं . किसी लड़के से बात न करना या उससे शादी के लिए इंकार कर देना क्या इतना बड़ा गुनाह है कि उसे उम्र भर के लिए उम्र कैद दे दी जाए बिना किसी सुनवाई के जैसा कि आजकल हो रहा है अक्सर लड़की द्वारा मना करने पर उस पर कभी तेज़ाब फेंक दिया जाता है या फिर गोली मार दी जाती है और ऐसा ही चक्रव्यूह राजीव रचता है और फिर उसे न केवल मानसिक रूप से बल्कि शारीरिक रूप से भी प्रताड़ित करता है , यहाँ तक कि शारीरिक संबंधों में भी एकाधिकार की भावना के साथ वो ही पितृ सत्तात्मक सोच का हावी होना कि औरत तो होती ही मर्द की जड़ खरीद गुलाम है या ये तो स्त्री का कर्तव्य है पुरुष को शारीरिक सुख दे बेशक वो बीमार हो या अभी कुछ देर पहले उसे बुरी तरह कूटा गया हो या उसके पैर जल गए हों मगर मर्द की भूख शांत होनी जरूरी है मना करने पर सास द्वारा भी उसे ही दोषी सिद्ध कर देना एक नारी के जीवन का सबसे दुखद पहलू है कि कैसे एक स्त्री ही दूसरी स्त्री की दुश्मन बन जाती है जिसे अपने बेटे और पैसों के सिवा कुछ नहीं दिखता . वहीँ ससुर भी पैसे का इतना पुजारी कि एक दिन उसे जान से मारने के लिए बेटे को ही प्रोत्साहित कर दे और फिर दूसरी शादी करने के लिए कह दे वहां कैसे उम्मीद की जा सकती है राजीव जैसे करैक्टर से किसी सकारात्मकता की या उसकी अच्छी सोच की . कहीं न कहीं उसके घर का माहौल और उनकी सोच ही उसके व्यक्तित्व के विकास में शामिल रही और रही सही कसर उसकी दादी के लाड प्यार में जिद्दी बना देने ने पूरी कर दी , जो यही सिद्ध कर रहा है कहीं न कहीं न केवल पूरा पारिवारिक माहौल बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी औरतों का उसी सोच को पोषित कर देना इसमें शामिल है वर्ना जिस सास ने ऐसा कुछ भुगता हो कम से कम उससे उम्मीद नहीं की जाती कि वो अपनी बहू के साथ ऐसा कुछ करेगी लेकिन ये कुछ कुंठित सोच हैं जिन्होंने खून में ऐसे जड़ें जमा ली हैं कि चाहकर भी बाहर नहीं आ पातीं और वो ही व्यवहार करती हैं जो उन्होंने खुद सहा है बल्कि उससे भी ज्यादा बेरहम हो उठती हैं . वैसा ही देवर और ननद सिवाय छोटे देवर संजीव के क्योंकि वो अभी बच्चा है और गलत और सही के दृष्टिकोण से सब देखता है और वो ही एक सहारा बनता है वहां जया का लेकिन उसकी भी अपनी सीमाएं हैं ऊपर से राजीव का खौफ पूरे परिवार में एक दहशत की तरह व्याप्त है ऐसे माहौल में बच्चे के आने की उम्मीद में ये सोचना कि शायद अब सब सही हो जाए , कोई गलत नहीं मगर वहां सब गलत है क्योंकि बच्चा पैदा होने पर हक़ बन जायेगा उसका और उससे उन्हें छुटकारा नहीं मिलेगा इसलिए इसके बच्चे को मार दो या इसे ही , ऐसी सोच हो जहाँ , ऐसा विषाक्त वातावरण हो जहाँ वहां कैसे जीवन आकार ले सकता है ? मगर ले सकता है जब एक स्त्री जो असहाय लाचार बेबस का जीवन जी रही होती है जब अपने बच्चे के आने की आहट पाती है तो उसे बचाने की शक्ति भी जाने कहाँ से उसमे आ जाती है और वो हर अत्याचार सह जाती है सिर्फ अपने बच्चे के लिए और ऐसा ही जया के साथ हुआ . जहाँ उसने जगह जगह अपने हौसले का परिचय दिया बेशक सारे ज़माने के दुःख दर्द झेले मगर कमज़ोर नहीं पड़ी , यही जिजीविषा उसे बचाए रही .

एक दूसरा पहलू जो इस उपन्यास में उभर कर आया है वो हमारी सामाजिक मानसिकता है चाहे कितना ही आधुनिक होने का दंभ भरें या कितना ही पढ़े लिखे हों , यहाँ की कुंठित सोच , दकियानूसी विचार नहीं बदलते फिर चाहे राजीव हो या जया के परिवार वाले . जया के परिवार की सोच लड़का पढ़ा लिखा है , कलेक्टर है तो ब्याह दो कोई जांच पड़ताल नहीं करो और उसके बाद भी उसे ही सहने को विवश करते रहो ये कह कि स्त्री तो होती ही सहने के लिए है , सभी स्त्रियाँ करती हैं , जया की माँ की वो ही दकियानूसी परंपरागत सोच और अत्यधिक सीधापन उनकी अपनी ही बेटी के लिए भारी पड़ता रहा यहाँ तक कि जब वो सब छोड़कर आ गयी तब भी माँ उसे खुलेमन से स्वीकार नहीं पायी . ‘मर्द तो गुस्सा हो ही जाते हैं तो क्या हुआ’ वाली सोच से वो खुद को मुक्त नहीं कर पायी बेशक अंत आते आते सोच उनकी बदली लेकिन उनकी इसी सोच के कारण जया ने ये सब झेला यदि घर से उसे सहारा मिलता तो उस नरक को वो कब का छोड़ चुकी होती लेकिन जब एक स्त्री के लिए सारे दरवाज़े बंद हो जाते हैं तब या तो घुट घुटकर सहने को विवश होती है या फिर वो जब अत्याचार सहने में असमर्थ हो जाती है तो अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर लेती है . वहीँ राजीव जो कलेक्टर तो बेशक बन गया मगर अपनी दकियानूसी सोच से बाहर नहीं आ पाया . कहते हैं शिक्षा जीवन में उजास भर देती है लेकिन अक्सर शिक्षा भी ऐसे अमर्यादित संस्कारों के आगे हार जाती है क्योंकि सब कुछ बदल सकता है इंसान का स्वभाव नहीं बदल सकता और अपने अहम् को पोषित करने के लिए राजीव द्वारा हर संभव प्रयत्न किये गए कि एक भी पल जया सुख की साँस न ले सके . जब तक साथ थी तब भी और अलग होने के बाद भी , न तलाक दिया न उसे चैन से रहने दिया , जो यही दर्शाता है पुरुष के लिए स्त्री सिर्फ खिलौना है और उसको प्रमाणित जया की अलग होने के बाद वाली ज़िन्दगी करती है जब भी कहीं नौकरी की और राजीव की वजह से जब लोगों को उसके बारे में पता चला तो सबने उसका किसी न किसी तरह शोषण ही करना चाहा , उसे आसानी से उपलब्ध समझा . सभी पढ़े लिखे ऊंचे ओहदों पर लेकिन सोच और विचारों से वो ही एक आम स्त्री देह लोलुप ही थे फिर छोटे शहर में हों या बड़े में . ये मानसिक विकृति यदि राजीव में भी थी तो कौन सी उनसे जुदा थी औरों की ढकी हुई थी और उसकी सामने आ गयी थी वर्ना अन्दर से सारा पुरुषवर्ग एक सा ही होता है मानो लेखिका यही कहना चाह रही हों .

वहीँ एक पति से अलग रहने वाली स्त्री को न केवल पुरुष वर्ग बल्कि स्त्रियाँ भी गलत नज़र से ही देखती हैं फिर चाहे वो बड़े ऑफिसर की पत्नियाँ हों या ठेठ दकियानूसी समाज और ऐसा ही जया के साथ होता रहा , हर जगह . साथ ही कानूनी लड़ाई , बच्चों की कस्टडी और राजीव से बच्चों का खर्चा लेना हो , सब साथ साथ चलते रहे और उस समय कैसी समस्याएं सामने आयीं उन पर भी लेखिका ने बाकायदा नज़र डाली यहाँ तक कि अंत में जया का वकील तक उसे प्राप्य समझने लगा तो दूसरी तरफ पुलिस में फैले भ्रष्टाचार का भी पर्दाफाश किया फिर वो स्त्री हो या पुरुष सब पैसे और रसूख के आगे झुकते हैं ऐसे में एक स्त्री खुद को कितना असहाय और निसहाय पाती है ये वो ही समझ सकती है लेकिन जया ने खुद का हौसला नहीं खोया और अपने बच्चों को भी एक मुकाम दिलाया तो साथ भी लेखन के माध्यम से एक ऐसा मुकाम पाया जिसका उसने कभी सपना भी नहीं देखा था , सोचने पर विवश करता है यदि स्त्री चाहे तो अपनी कमजोरियों पर विजय प्राप्त कर एक उच्च मुकाम पा सकती है .
ये उपन्यास स्त्री विमर्श का जीवंत उदाहरण इसी वजह से है क्योंकि यहाँ स्त्री अपनी कमजोरी पर विजय प्राप्त करती है न कि ‘नीर भरी दुःख की बदरी’ बन कर रह जाती है और यही है सार्थकता किसी भी विमर्श की जब वो मुकाम पाए न कि उसे अधूरा छोड़ दिया जाए उसके दर्द के साथ , जो कि आज तक हम पढ़ते आये हैं अक्सर कहानियों और उपन्यासों में और फिर चाहते हैं स्त्री ऐसी ही बनी रहे लेकिन यहाँ लेखिका ऐसा नहीं चाहती जो उसकी प्रगतिशील सोच को दर्शाता है साथ ही वो चाहती है कि स्त्री सशक्त बने और सबके लिए एक उदाहरण ताकि आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन जगमगाये .

एक ख़ास बात , इस उपन्यास पर बहुत ऊँगलियाँ उठेंगी क्योंकि ये समाज पुरुष प्रधान है ऐसे में एक स्त्री की दुर्दशा इतनी बेबाकी से आखिर लेखिका ने लिख कैसे दी , हलक से नीचे नहीं उतरेंगी सच्चाइयाँ ........सब कुछ जानते समझते भी लोग इसकी परतें उखाड़ना चाहेंगे .........लेकिन रश्मि बधाई की पात्र है जो उसने इतनी हिम्मत की और समाज के नकाब को उतारने की कोशिश की .........कैसे दोगले चेहरे आस पास नुमाइंदा हैं , हम जानते हुए भी चुप रहते हैं अक्सर . ये उपन्यास पुरुष के हलक में ऊँगली डाल उसका मुखौटा उगलवाने वाला है . पितृ सत्तात्मक सोच पर कड़ा प्रहार है तो हो सकता है लेखिका को नकारने की एक सोची समझी साजिश भी बुनी जाए मगर यहीं हौसलों को उसे उड़ान देनी होगी तभी साहित्य जगत में अपनी लेखनी को मुकाम दिलवा पाएगी क्योंकि अस्वीकार्यता या नकारात्मकता ही सफलता की पहली सीढ़ी होती है .

लेखिका रश्मि रविजा की लेखनी के तो हम शुरू से कायल रहे मगर अब तक टुकड़ों में पढ़ते रहे मगर अब जब प्रिंट में आया तो लगा कि हाँ , लेखनी हो तो ऐसी जो पाठक को ऐसे बाँध ले कि जब तक पूरा न पढ़ ले कोई काम न कर सके . यहाँ तक कि जितनी बार पढ़े कभी असहजता महसूस न करे बल्कि हर बार मंत्रमुग्ध हो पढता चला जाए . लेखिका के लेखकीय जीवन के लिए ढेरों शुभकामनाएं , उनकी कलम निर्बाध रूप से चलते हुए समाज को सदा दिशा प्रदान करती रहे .


शनिवार, 12 दिसंबर 2015

यूँ ही कभी कभी ...

कि
सुलग रही हैं आजकल
खामोशियाँ मेरी
और
जलने के निशान ढूँढ रहे हैं
जिस्म मेरा

जाने क्यूँ
रूह की खराश से
बेदम हुआ सीना मेरा

कि
बंदगी का ये आगाज़ था न अंजाम
फिर भी
गुनहगार है कोई नाखुदा मेरा

सोचती हूँ यूँ ही कभी कभी ...


बुधवार, 2 दिसंबर 2015

यूँ ही तन्हा तन्हा

गुजर गयीं मेरे अन्दर
जाने कितनी सदियाँ
यूँ ही तन्हा तन्हा

जाने कौन सी तलाश है
जो न तुझ तक पहुँचती है
और न ही मुझ तक

कि आओ
बेखबर शहरों तक चलें दोनों
यूँ ही तन्हा तन्हा
बनकर डोम अपने अपने कब्रिस्तान के

यूँ के क्या कहूँ इसे
इंसानी नियति या फिर ... ?