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सोमवार, 30 मई 2016

मत सता गरीब को

"क्या हुआ जयंती ? आज बड़े उदास हो ? "

"हाँ , वो शशांक की माँ से जब से मिलकर आया हूँ मन बहुत खराब है ."


"क्यों, क्या हुआ उन्हें?"


"क्या कहें अब ऐसी औलाद को जिसे आज माँ ही बुरी लगने लगी . कल तक तो आगे पीछे डोलते थे लेकिन जिस दिन से बेचारी ने बेटों को मुख्तियार बना दिया मानो अपने हाथ ही काट लिए . अब घर पर कब्ज़ा कर लिया और माँ को एक कोठरी में जगह दे दी . यहाँ तक कि उससे एक तरह से सब सम्बन्ध ही ख़त्म से कर लिए . लाखों रुपया कमाने वाले न बोलते हैं न हाल चाल पूछते हैं . बस दो वक्त की रोटियां भी उनकी बीवियाँ अहसान सा करके देती हैं . शरीर भी साथ नहीं देता लेकिन हौसले से सब झेलती रही ये सोच माना पति से हमेशा छत्तीस का आँकड़ा रहा , उसके लिए सिर्फ एक भोग्या ही रही , उससे इतर भी स्त्री होती है या उसकी भी कुछ इच्छाएं होती हैं , उसका कोई लेना देना नहीं रहा लेकिन औलाद तो मेरी है , वो मेरा दर्द समझेगी , ये सोच हर आतंक पति का सहती गयी . आज न पति उसका न बेटे . जाए तो कहाँ जाए ? किसके सहारे जीवन यापन करे ?" बहुत ही परेशान स्वर में जयंती ने कहा .

"अजी छोड़े ऐसे पति को और लात मारे ऐसी औलाद के . अपने दम पर जीये ." राम ने जवाब दिया .

"कहना जितना आसान होता है न सहना उतना ही मुश्किल . अपने पेट जाए जब ऐसा व्यवहार करते हैं तो खून के आंसू रोती है एक माँ ."

"जानते हैं हम इस बात को तभी कह रहे हैं एक तो उनकी परवाह करना छोड़ दे . दूसरे क्यों कोठरी में जीवन यापन करती है , अपने हक़ के लिए लडे ."

"वो तो ठीक है लेकिन अपनों से लड़ना सबसे मुश्किल होता है और फिर कोई सहारा तो हो जिसके दम पर लड़ाई लड़ी जाए . वो इसी बात का तो फायदा उठा रहे हैं जानते हैं अकेली है . बेचारी बस चुपके चुपके आंसू बहाती है ."

"देखना उसके आँसू , उसकी आहें एक दिन ऐसी तबाही लायेंगी बेटे कहीं के नहीं रहेंगे शायद उस दिन उन्हें अपनी माँ का दर्द समझ आये लेकिन तब तक शायद बहुत देर हो चुकी हो ...."

"कमज़र्फ औलादें आजकल की जाने किस मिटटी की बनी होती हैं . माँ दर्द से बिलबिला भी रही हो तो भी उसकी चीख सुनाई नहीं देती और यदि बीवी या बच्चे के सर में दर्द भी हो जाए तो सारे काम छोड़ उसकी तरफ दौड़ पड़ते हैं . कैसे इतने निर्मोही और कृतघ्न हो जाते हैं समझ नहीं आता . कैसे भूल जाते हैं यही माँ थी जिसने सब कुछ सहा सिर्फ उनकी खातिर"

"चिंता न कर जयंती भाई ,वो कहते हैं न --- मत सता गरीब को वो रो देगा , गर सुन लेगा उसका खुदा तुझे दुनिया से खो देगा."

मत भूल जो तूने बोई है वो ही फसल काटेगा
अपने किये पर एक दिन चकरघिन्नी सा नाचेगा
ये वक्त वक्त की बात है लाठी तेरे हाथ है
जिस दिन पड़ेगी उसकी बेहिसाब काँपेगा

रविवार, 1 मई 2016

हाशिये का नवगीत

ये हाशिये का नवगीत है
जो अक्सर
बिना गाये ही गुनगुनाया जाता है

एक लम्बी फेहरिस्त सा
रात में जुगनू सा
जो है सिर्फ बंद मुट्ठियों की कवायद भर

तो क्या हुआ जो
सिर्फ एक दिन ही बघार लगाया जाता है
और छौंक से तिलमिला उठती हैं उनकी पुश्तें

तुम्हारे एक दिन के चोंचले पर भारी है उनके पसीने का अट्टहास


सन्दर्भ --- मजदूर दिवस